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धरती की वो जगह जहां तैयारी करने जाते हैं अंतरिक्षयात्री, चांद पर जाने वाले भी आ चुके हैं यहां

Sun, 29 Dec 2019 04:47 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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धरती की वो जगह जहां तैयारी करने जाते हैं अंतरिक्षयात्री - फोटो : Social media
20 जुलाई, 1969 को अमेरिकी अंतरिक्षयात्री नील आर्मस्ट्रांग अपोलो-11 के चंद्रयान ईगल से बाहर निकले और चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान बन गए। उन्होंने घोषणा की, 'उनका वह छोटा-सा कदम मानवता की बड़ी छलांग है।' चांद पर अमेरिकी झंडा फहराने के 50 साल बाद भी उस पल को अमेरिकी महानता का यादगार पल माना जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि मानवता की उस विजयी छलांग के पीछे आइसलैंड का भी हाथ था। 
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हुसाविक, आइसलैंड - फोटो : Social media
अपोलो 11 मिशन से पहले नासा अंतरिक्षयात्रियों को ऐसी जगह ट्रेनिंग देना चाहता था, जहां की धरती चांद की सतह से मिलती-जुलती हो। इसके लिए आइसलैंड के उत्तरी तट पर हुसाविक को चुना गया, जो 2,300 मछुआरों का एक छोटा शहर था। नासा ने 1965 से 1967 के बीच प्रशिक्षण के लिए 32 अंतरिक्षयात्रियों को यहां भेजा था। अब तक जिन 12 लोगों ने चांद पर कदम रखा है उनमें से नौ पहले हुसाविक आए थे, जिनमें आर्मस्ट्रांग भी शामिल थे।  
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चांद की सतह पर इंसान - फोटो : Social media
आर्मस्ट्रांग के चांद पर कदम रखने के 22 मिनट बाद अपोलो 11 के दूसरे अंतरिक्षयात्री एल्ड्रिन बाहर निकले थे। चांद के विशाल और निर्जन क्षेत्र को देखकर एल्ड्रिन ने उसे 'शानदार एकांत' कहा था, जो आइसलैंड के लिए भी सटीक है। आर्कटिक के पास दुनिया के सबसे अस्थिर टेक्नोटिक प्लेटों पर बसा आइसलैंड एक विशाल प्रयोगशाला की तरह है। गर्म पानी के कुदरती गीजर, झरने और नॉर्दर्न लाइट्स याद दिलाते हैं कि इंसान ब्रह्मांड में कितने महत्वहीन हैं। 

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हुसाविक, आइसलैंड - फोटो : Social media
आइसलैंड का 80 फीसदी इलाका निर्जन है और 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा लावा के रेगिस्तान और ग्लेशियर से ढका है। ओर्लीग्योर नेफिल ओर्लीग्सन हुसाविक के दि एक्सप्लोरेशन म्यूजियम के निदेशक हैं। वह कहते हैं, 'आइसलैंड बिल्कुल चांद की तरह दिखता है। यहां दूसरी दुनिया जैसे नजारे दिखते हैं, खासकर गर्मियों में जब उत्तरी आर्कटिक रेगिस्तान में बर्फ कम गिरती है।' 
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हुसाविक, आइसलैंड - फोटो : Social media
अंतरिक्षयात्रियों को यहां भेजने की सिर्फ यही एक वजह नहीं थी। इसका कारण जियोलॉजी (भूविज्ञान) था। नासा चाहता था कि अंतरिक्षयात्री चांद के पत्थरों के सबसे बढ़िया नमूना लकर आएं, इसीलिए उन्हें प्रशिक्षण के लिए ऐसी जगह भेजा गया जहां पत्थरों की संरचना चांद की सतह से मिलती-जुलती है। अपोलो मिशन के उपकरणों की जांच के लिए नासा अंतरिक्षयात्रियों को पृथ्वी के उन हिस्सों में भेजता था, जहां का परिवेश धरती के दूसरे हिस्सों से बिल्कुल अलग हो। नासा ने अंतरिक्षयात्रियों को हवाई और एरिजोना को मेट्योर क्रेटर भी भेजा, लेकिन आइसलैंड के वीरान पर्वतीय क्षेत्र की बैसाल्ट चट्टानें और ज्वालामुखीय परिवेश चांद जैसी स्थितियों में प्रशिक्षण के लिए सबसे उपयुक्त थे। 
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हुसाविक, आइसलैंड - फोटो : Social media
जुलाई 1965 में एक सप्ताह के लिए और जुलाई 1967 में 10 दिनों के लिए 32 अंतरिक्षयात्रियों को हुसाविक के पास प्रशिक्षण दिया गया कि चांद से वे किस तरह के पत्थरों के नमूने लें। उनको अस्कजा ज्वालामुखी, रॉसबोर्ग क्रेटर और ड्रेकगिल के लावा मैदान या ड्रैगन गली में प्रशिक्षण दिया गया। 1971 में अपोलो 15 मिशन में चांद पर जाने वाले कमांड मॉड्यूल के पायलट अल वॉर्डेन कहते हैं, 'मैंने आइसलैंड के सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्रों में 10 दिन बिताए। वह जगह इतनी वीरान है कि मुझे लगता था कि मैं पहले ही चंद्रमा पर पहुंच चुका हूं। हम गर्मियों में वहां थे। ऐसा लगता था कि सूरज कभी डूबता ही नहीं। रात के तीन बजे भी लोग गलियों में घूमते थे, दुकानें खुली रहती थीं।' 
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नील आर्मस्ट्रांग - फोटो : Social media
1967 में एक भूगर्भविज्ञानी ने 19 साल के चरवाहे इन्गोल्फर जोनासन से पूछा था कि अपोलो मिशन के दो अंतरिक्षयात्री- नील आर्मस्ट्रांग और बिल एंडर्स मछली मारने जाना चाहते हैं तो क्या वह उनके साथ जाएंगे। जोनासन कहते हैं कि वे दोनों घर पर आए और मैं उनको नदी तक ले गया। आर्मस्ट्रांग दयालु व्यक्ति थे। उनका बड़ा नाम था, लेकिन मछली पकड़ने में वह उतने अच्छे नहीं थे। दोनों अंतरिक्षयात्री उस शाम सामुदायिक केंद्र में डांस के लिए भी गए, जहां जोनासन उनके साथ रहे। जोनासन के मुताबिक, वे आए तो सभी लोगों ने उनका सम्मान किया। वे अंतरिक्षयात्री थे और अध्ययन प्रशिक्षण के लिए आइसलैंड आए थे। उन्होंने स्थानीय लड़कियों के साथ डांस भी किया।' दो साल बाद जोनासन ने रेडियो पर सुना कि नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर पहला कदम रख दिया है वह गर्व से भर गए। वह कहते हैं, 'उन पलों को आप भूल नहीं सकते। वह मेरे लिए बहुत खास था, क्योंकि उन पलों में मैं उस व्यक्ति को जान पाया था।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
हाल के वर्षों में हुसाविक की पहचान व्हेल से जुड़ी है। सैलानी हर साल गर्मियों में यहां के खूबसूरत हार्बर पर आते हैं ताकि उन्हें ब्लू, हंपबैक और मिंकी व्हेल दिख जाएं। लेकिन हाल तक किसी को भी नहीं पता था कि इंसान के चंद्रमा तक पहुंचने के इतिहास में इस शहर का भी योगदान है। ओर्लीग्सन कहते हैं कि ये सब चीजें आप स्कूल में नहीं पढ़ते। वह बचपन में अंतरिक्ष जाने के सपने देखा सकते थे। 2009 में उन्हें 1965 का एक पुराना अखबार मिला जिसमें अपोलो अंतरिक्षयात्रियों के प्रशिक्षण के लिए आइसलैंड आने की खबर छपी थी। 

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द एक्सप्लोरेशन म्यूजियम - फोटो : Social media
2014 में ओर्लीग्सन ने एक्सप्लोरेशन म्यूजियम खोला। यहां ऐतिहासिक तस्वीरें, कलाकृतियां, चंद्रमा से लाए गए पत्थर (जिन्हें पूर्व अंतरिक्षयात्रियों ने उपहार में दिए हैं), नासा के स्पेसशूट की प्रतिकृति और आर्मस्ट्रांग का इस्तेमाल किया हुआ मछली का कांटा भी रखा है। आर्मस्ट्रांग परिवार ने हाल ही में अपोलो 11 मिशन में नील आर्मस्ट्रांग का क्रू बैज दान दिया है। यहां अपोलो 11 के चंद्रयान ईगल की एक छोटी प्रतिकृति भी रखी है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : NASA
नासा कई सालों से 2020 में मंगल पर रोवर भेजने की महत्वाकांक्षी योजना की तैयारी के लिए आइसलैंड के भूतापीय स्थलों का अध्ययन कर रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक आइसलैंड के ग्लेशियर, ज्वालामुखी और गरम झरने ठीक वैसे ही हैं जैसे मंगल पर अरबों साल पहले थे। आइसलैंड के लोहे से युक्त चट्टानों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह पता लगाने में सक्षम हैं कि पहले पानी कहां बहता था। 

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आइसलैंड में अंतरिक्ष यात्री - फोटो : Social media
ओर्लीग्सन कहते हैं कि अपोलो अंतरिक्षयात्रियों ने मुझे बताया है कि आइसलैंड मंगल पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों के प्रशिक्षण के ज्यादा उपयुक्त है। हम मंगल के भूविज्ञान के बारे में बहुत कुछ जानते हैं क्योंकि पिछले कुछ समय से रोवर्स मंगल की सतह का अध्ययन कर रहे हैं। वहां उन्होंने पता लगाया है कि आइसलैंड और मंगल के भूविज्ञान में बहुत कुछ समान है। नासा और दूसरी स्पेस एजेंसियों ने आइसलैंड में भविष्य के अपने उपकरणों का परीक्षण पहले ही शुरू कर दिया है। मंगल मिशन के लिए यहां के लावा ट्यूव्स और गुफाएं बहुत योगदान दे सकती हैं। मंगल पर जाने के लिए अंतरिक्ष यानों को अपना वजन कम करना पड़ेगा। ओर्लीग्सन कहते हैं कि यदि हम वहां रहने के लिए लावा ट्यूव और गुफाओं की संरचना का इस्तेमाल करें तो हमें बहुत सारे उपकरण ले जाने की जरूरत नहीं होगी। इसीलिए स्पेस एजेंसियां आइसलैंड में (हवा से) फुलाए जा सकने वाला उपकरणों का परीक्षण कर रही हैं कि कैसे मंगल पर गुफाओं को इंसान के रहने योग्य बनाया जा सके। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
पिछले सितंबर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की छात्रा गनहिल्डर फ्रिओ हॉलग्रिम्सडॉटिर आइसलैंड की पहली महिला बनीं जिनको वही प्रशिक्षण दिया गया जो 1965 से 1967 के बीच अपोलो के अंतरिक्षयात्रियों को दिया गया था। उनके साथ अमेरिका की टीनएजर एलिशा कार्सन को मंगल पर जाने वाले पहले अंतरिक्षयात्रियों में से एक बनने का प्रशिक्षण दिया गया। हॉलग्रिम्सडॉटिर कहती हैं कि हम धरती पर उन अधिकतर जगहों पर गए जो मंगल जैसे हैं। मेरे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि आइसलैंड ने कैसे इंसान को चांद पर ले जाने में अहम भूमिका निभायी। इसने मेरे जुनून को बढ़ाया है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
हॉलग्रिम्सडॉटिर को लगता है कि नासा ने अपोलो मिशन में किसी महिला अंतरिक्षयात्री को शामिल नहीं करके बहुत बड़ा मौका खो दिया है। वह कहती हैं कि अब यह बदल गया है। मुझे विश्वास है कि मंगल पर पहले मिशन के लिए सबसे योग्य व्यक्ति को चुना जाएगा और उम्मीद है कि वह एक महिला होगी। मेरा सपना है कि मैं मंगल पर जाऊं। आइसलैंड की सरकार यूरोपियन स्पेस एजेंसी से जुड़ने का फैसला कर चुकी है। युवाओं, खासकर लड़कियों के लिए संदेश साफ है- यदि आप अंतरिक्षयात्री बनना चाहते हैं तो यह मुमकिन है।  
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