यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब जांजीबार के सुल्तान हमद बिन थुवैनी की अचानक मृत्यु हो गई। इसके बाद खालिद बिन बरघाश ने बिना ब्रिटिश मंजूरी के खुद को वहां का सुल्तान घोषित कर दिया। उस समय जांजीबार पर ब्रिटेन का प्रभाव काफी मजबूत था और किसी भी नए शासक को उनकी स्वीकृति लेनी जरूरी होती थी। खालिद द्वारा उठाया गया यह कदम ब्रिटेन को नागवार गुजरा और हालात तेजी से टकराव की ओर बढ़ने लगे।
ब्रिटेन ने खालिद को स्पष्ट चेतावनी दी कि वह अपनी कुर्सी छोड़ दें। इसके लिए ब्रिटेन ने सुबह 9 बजे तक का समय दिया। खालिद ने ब्रिटेन द्वारा दिए गए इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया। समय सीमा जैसे ही खत्म हुई, ब्रिटिश नौसेना ने हमला शुरू कर दिया। उनके युद्धपोत पहले से ही बंदरगाह पर तैनात थे, जिससे हमला बेहद तेजी और ताकत के साथ किया गया।
यह युद्ध पूरी तरह एकतरफा था। ब्रिटिश सेना की ताकत के सामने जांजीबार ज्यादा देर टिक नहीं पाया। गोलाबारी के दौरान सुल्तान का महल और उसकी शाही नाव पूरी तरह तहश नहश हो गई। इस संघर्ष में जांजीबार के सैकड़ों लोग घायल हुए, जबकि ब्रिटेन की ओर से नुकसान बहुत कम हुआ। यह असमान लड़ाई जल्द ही अपने अंत की ओर बढ़ने लगी।
करीब 9 बजकर 40 से 45 मिनट के बीच सुल्तान का झंडा नीचे गिरा और लड़ाई समाप्त हो गई। इसके बाद खालिद वहां से भाग गया और ब्रिटेन ने अपनी पसंद का शासक स्थापित किया। इस कारण यह घटना सबसे छोटे युद्ध के रूप में जानी जाती है। यह युद्ध यह भी दर्शाने का काम करता है कि उस दौर में साम्राज्यवादी ताकतें कितनी शक्तिशाली थीं।