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दुनिया का इकलौता ऐसा शहर, जो दो देशों के बीच बंटा हुआ है

Mon, 17 Feb 2020 09:00 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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निकोसिया, साइप्रस - फोटो : Social media
भूमध्य सागर में स्थित देश साइप्रस पिछले करीब 45 साल से दो हिस्सों में बंटा हुआ है। इसकी राजधानी निकोसिया भी तुर्की और ग्रीस के बीच कब्जे की लड़ाई की शिकार है। 1974 में तुर्की की सेना ने साइप्रस पर हमला करके इसके एक हिस्से पर कब्जा कर लिया था। साइप्रस में यूनानियों और तुर्की मूल के लोगों की आबादी कमोबेश बराबर है। 1974 में जंग के बाद तुर्की ने साइप्रस के 40 फीसदी हिस्से पर अपना अधिकार जमा लिया। आखिरकार जब युद्ध विराम हुआ, तो देश दो हिस्सों में बंट गया। 
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निकोसिया, साइप्रस - फोटो : Social media
30 साल पहले बर्लिन की दीवार गिरने के बाद निकोसिया ही दुनिया का इकलौता शहर है जो दो देशों के बीच बंटा हुआ है। 1974 में हुए युद्ध विराम के बाद तुर्की और ग्रीस के कब्जे वाले इलाकों के बीच में 180 किलोमीटर लंबा गलियारा संयुक्त राष्ट्र ने बनाया था, जो निकोसिया के बीच से गुजरता है। इसे ग्रीन लाइन कहा जाता है। 
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ग्रीन लाइन, निकोसिया - फोटो : Social media
बंटवारे की वजह से साइप्रस की 25 फीसदी आबादी बेमुल्क और बेघर हो गई थी। तुर्की के कब्जे वाले इलाके में रहने वाले यूनानी मूल के करीब डेढ़ लाख लोगों को निकाल दिया गया था। इसी तरह यूनान के कब्जे वाले इलाके से तुर्की मूल के 50 हजार लोगों को निकाल दिया गया था। निकोसिया की रहने वाली मारिया बाल्ताजी उन लोगों में से हैं जिनका परिवार इस बंटवारे का शिकार हुआ था। उनके चाचा जॉर्ज डेविड, पेट्रा नाम के गांव में पले-बढ़े थे। जंग के दौरान ये बर्बाद हो गया था। अब ये ग्रीन लाइन में पड़ता है। यहां आबादी अब नहीं बची है। बाल्ताजी के परिवार की 45 हेक्टेयर जमीन इसी इलाके में पड़ती है। इनमें करीब छह हजार जैतून के पेड़ हैं, जिनमें से कुछ तो हजार साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इस इलाके में संयुक्त राष्ट्र की सेनाएं गश्त लगाती रहती हैं। 

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ग्रीन लाइन, निकोसिया - फोटो : Social media
2003 के बाद से इस इलाके में बिछी बारूदी सुरंगों को हटाने का काम शुरू हुआ था। करीब 27 हजार बारूदी सुरंगें साफ की गईं, जिसके बाद यहां लोगों को खेती करने की इजाजत दे दी गई है। मारिया बाल्ताजी का ख्वाब था कि वो अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करें। छह साल पहले अपने देश लौटने के बाद मारिया ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर खेती के नए तरीकों को अपनाया और अब वो अपने गांव में ऑर्गेनिक फार्म चलाती हैं। उन्होंने ग्रीस की राजधानी एथेंस में अपनी मार्केटिंग की नौकरी छोड़कर ये काम शुरू किया है। उनके दोस्त नेतिएन इस मिशन में साझीदार हैं। बरसों से वीरान पड़ी जमीन पर फसलें लहलहाने लगी हैं।  
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बफर जोन, निकोसिया - फोटो : Social media
जब मारिया के दोस्त नेतिएन ने छह साल पहले ये जमीन देखी थी, तो ये इलाका सूखा हुआ था। वजह ये थी कि साइप्रस के लोगों को इस बफर जोन में आने की इजाजत नहीं थी। यहां बारूदी सुरंगें बिछी होने से उनकी जान को खतरा था, लेकिन बारूदी सुरंगें हटाए जाने के बाद यहां खेती शुरू हो चुकी है। नेतिएन कहते हैं कि, 'यहां पर 1974 के बाद से कीटनाशकों का छिड़काव नहीं हुआ था। यानी यहां कीड़े-मकोड़ों की तमाम नस्लें बची हुई थीं। इसका फायदा ये है कि जैतून पर लगने वाले कीड़े, पेड़ पर पहुंचें उससे पहले ही उन्हें शिकारी जीव चट कर जाते हैं।'
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बफर जोन, निकोसिया - फोटो : Social media
यहां पर हजार साल से भी ज्यादा पुराने जैतून के पेड़ हैं। इसके अलावा मारिया की जमीन पर तरह-तरह के जीव जैसे खरगोश, लोमड़ी और कई परिंदे आबाद हैं। आज मारिया और नेतिएन यहां पर घोड़े, गाय, मुर्गियां और गधे पालते हैं। अपनी जमीन पर अंजीर, नाशपाती और दूसरी फसलें उगाते हैं। वो अपने बाग से एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल निकालते हैं। मारिया कहती हैं कि उन्होंने सैकड़ों सैनिकों के बीच रहने का तसव्वुर भी नहीं किया गया था, लेकिन अब यहां बहुत सुकून मिलता है। प्रदूषण नहीं है। गिने-चुने लोग रहते हैं, जो एक-दूसरे को जानते हैं। मारिया के दोस्त और साझीदार नेतिएन कहते हैं कि कई दशक से कीटनाशक न छिड़के जाने से यहां नुकसानदेह कीड़ों को खाने वाले छोटे जीव मौजूद हैं, जो पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े-मकोड़ों को चट कर जाते हैं। 
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जैतून का तेल (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
मारिया को अपने पुश्तैनी गांव में आकर रहने की तब सूझी, जब उनके चाचा लगातार वहां के बचपन के किस्से सुनाते थे। आज वो यहां रहकर जड़ों से जुड़े होने का अहसास पाती हैं। मारिया और नेतिएन अपने खेतों में कई तरह की फसलें और जड़ी-बूटी उगाते हैं। हजारों जैतून के पेड़ों से वो खास तौर से तैयार होने वाला जैतून का तेल निकालते हैं। इसे दुनिया का सबसे शुद्ध एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल का खिताब मिल चुका है। एथेंस की नेशनल और कैपोडिस्ट्रियन यूनिवर्सिटी ने लंबी जांच-परख के बाद मारिया के फार्म के जैतून के तेल को बेहतरीन बताया है। इसकी तुलना 10 देशों से आए जैतून के तेल की सात हजार किस्मों से की गई थी। अब कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी इस तेल की खूबियों की पड़ताल कर रही है। संकेत ऐसे मिले हैं कि इससे कैंसर के इलाज में मदद मिलेगी। 

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जैतून का तेल (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
आज मारिया और उनके साझीदार दुनिया भर में अपना खास जैतून का तेल बेचते हैं। 2016 से 2019 के बीच इसे कई अवार्ड भी मिल चुके हैं। एथेंस यूनिवर्सिटी के नतीजों से स्थानीय किसान हैरान थे। उन्होंने अब मारिया और उनके साथी को पूरी तरह अपना लिया है। स्थानीय स्तर पर केमिकल और कीटनाशक के इस्तेमाल न होने की वजह से मारिया और नेतिएन के तेल में जरा भी मिलावट नहीं होती। 

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बफर जोन, निकोसिया - फोटो : Social media
मारिया का घर उनके खेतों के करीब ही है। वो यहां अपने बेटे, कुत्तों और बिल्ली के साथ रहती हैं। उनका शरणार्थी परिवार पांच किलोमीटर की दूरी पर ही रहता है। संयुक्त राष्ट्र के सैनिकों की गाड़ियां और हेलीकॉप्टर दिन मे दो बार गश्त के लिए आते हैं। इसके अलावा इलाके में शोर मचाने वाला कोई नहीं होता। मारिया के दोस्त यहां आते हैं तो कहते हैं कि तुम तो जन्नत में रह रही हो। मारिया के अलावा कुछ और किसानों ने भी बफर जोन में खेती शुरू कर दी है। वो अक्सर मिल-बैठकर खुशियां और गम साझा करते हैं। कोई संतरे दे जाता है तो मारिया उसे अपना खास जैतून का तेल दे देती हैं। इसी बहाने मेल-जोल भी हो जाता है। 
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बफर जोन, निकोसिया - फोटो : Social media
बफर जोन से दस किलोमीटर दूर मारिया के चाचा ने एक शिक्षा केंद्र खोला है। यहां मारिया के साझीदार नेतिएन पढ़ाने भी आते हैं। वो युवाओं को बिजनेस मैनेजमेंट से लेकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के तरीकों तक की जानकारी देते हैं। मारिया के लिए बंटे हुए साइप्रस के बीच का ये हिस्सा बहुत जज्बाती लगाव वाला है। वो चाहती हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर दूसरे साइप्रस वासी भी अपने देश लौट आएं। वो यहां ऑर्गेनिक फार्मिंग करें। खुद मारिया लोगों की मदद के लिए तैयार हैं। इसीलिए उन्होंने अपने फार्म को ऑर्गेनिक और मॉडल फार्म बनाया है। वो अब इससे और किसानों को जोड़ रही हैं ताकि ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा मिले। इसका दायरा बढ़े। 
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