बताया जाता है कि इस मंदिर की खोज सूर्य वंश के राजा ने की थी। सूर्य वंश के राजा ऋतुपर्णा का त्रेता युग में अयोध्या पर शासन था। राजा ऋतुपर्णा की यहीं पर नागों के राजा अधिशेष से मुलाकात हुई थी। मान्यताओं के मुताबिक, इस मंदिर की खोज करने वाले राजा ऋतुपर्णा पहले इंसान थे।
इस गुफा के अंदर राजा ऋतुपर्णा को नागों के राजा अधिशेष लेकर गए। इसी स्थान पर ऋतुपर्णा को भगवान शिव और अन्य देवी देवताओं के दर्शन प्राप्त हुए। फिर इस गुफा की कोई चर्चा नहीं की गई। इसके बाद पांडवों ने द्वापर युग में इस गुफा को खोजा। इस गुफा में पांडव भगवान की पूजा करते थे।
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स्कंदपुराण में कहा गया है कि पाताल भुवनेश्वर में भगवान शिव निवास करते हैं जहां सभी देवी देवता उनकी पूजा करने के लिए आते हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, जगदगुरु आदि शंकराचार्य ने कलयुग में इस गुफा की खोज की थी और यहां पर शिवलिंग स्थापित किया था जो तांबे का था।
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बताया जाता है कि नागों के राजा अधिशेष ने अपने सिर पर पृथ्वी का भार उठाया हुआ है। इस मंदिर में रणद्वार, पापद्वार, धर्मद्वार और मोक्षद्वार के नाम के चार दरवाजे हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, जब रावण की मौत हुई थी, तो पापद्वार बंद हो गया था। फिर महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद रणद्वार भी बंद हो गया था।
मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान गणेश का कटा सिर स्थापित है और यहां पर भगवान गणेश को आदिगणेश कहा जाता है। इस मंदिर में चार खंभे हैं जो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग का प्रतीक हैं। इनमें कलियुग के खंभे की लंबाई सबसे अधिक है।
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बताया जाता है कि इस गुफा में स्थित एक शिवलिंग लगातार बढ़ता जा रहा है। मान्यताओं के मुताबिक, जब यह शिवलिंग गुफा की छत को छू देगा, तो दुनिया समाप्त हो जाएगी। कहा जाता है कि इस गुफा में स्थित पत्थर से जानकारी मिल सकती है कि दुनिया कब समाप्त होगी।