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दुनिया के सबसे पुराने जीव, जो लाखों साल से हैं जिंदा, वैज्ञानिक भी अब तक नहीं सुलझा सके इनका रहस्य

Thu, 26 Dec 2019 04:19 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या आपको मालूम है कि दुनिया में सबसे उम्रदराज जीव कौन सा है? अगर नहीं मालूम, तो चलिए आपके साथ हम भी इस सवाल का जवाब तलाशते हैं। वैसे तो जानवरों में कछुए सबसे ज्यादा उम्र तक जीने वाले माने जाते हैं। एक कछुआ ढाई सौ बरस की उम्र तक जिंदा रहा था। इसी तरह कुछ अमेरिकी केकड़े करीब 140 साल तक जिए। कुछ मूंगे हजारों साल तक जीते रहते हैं। एक घोंघा जिसका नाम मिंग था, वो पांच सौ सात बरस का था, जब वैज्ञानिकों ने गलती से उसकी जान ले ली। मगर, ये आंकड़े फीके लगेंगे, जब आप ये जानेंगे कि धरती पर ऐसे बहुत से जीव हैं जो लाखों बरस से जिंदा हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
साइबेरिया, अंटार्कटिका और कनाडा के भयंकर सर्द माहौल में बर्फ की परतों के नीचे कई बैक्टीरिया हैं, जो दसियों लाख साल से वहीं, वैसे के वैसे पड़े हैं, बल्कि मजे में रह रहे हैं। ये कीटाणु, इतने सर्द माहौल में कैसे जी रहे हैं, ये बात अब तक किसी की समझ में नहीं आई। मगर, ये जरूर है कि अगर वो राज पता चल जाए, तो इंसान को भी अमर रहने की कुंजी मिल जाएगी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
1979 में रूसी वैज्ञानिक सबित एबिजोव, अंटार्कटिका में रूसी स्टेशन वोस्टोक पर काम कर रहे थे। तब उन्होंने 3600 मीटर की गहराई में कुछ बैक्टीरिया, कुछ फफूंद और दूसरे छोटे जीव खोज निकाले थे। लाखों टन बर्फ के नीचे, इतनी गहराई में पड़े इन जीवों के बारे में एबिजोव ने अंदाजा लगाया कि ये हजारों साल से ऐसे ही जिंदा हैं। ये जीव, धरती की ऊपरी परत से तो वहां गए नहीं होंगे। इसलिए इनकी उम्र लाखों साल ही मानी जा रही है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
2007 में ये रिकॉर्ड भी टूट गया। डेनमार्क की कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी की एक टीम और इसके अगवुएस्के विलरस्लेव पांच लाख साल पुराने जिंदा बैक्टीरिया को अंटार्कटिका, साइबेरिया और कनाडा के बेहद सर्द इलाकों से खोज निकाला। इसके दो साल बाद इससे भी पुराना एक जीवाणु मिला, करीब पैंतीस लाख साल की उम्र का। इसे रूसी वैज्ञानिक अनातोली ब्रोशकोव ने साइबेरिया में खोजा। ब्रोशकोव ने इस बैक्टीरिया को अपने शरीर में भी इंजेक्शन से डाल लिया। उन्हें लगा कि पैंतीस लाख साल से जिंदा ये बैक्टीरिया शायद उन्हें भी अमर बना दे। बाद में ब्रोशकोव ने दावा किया कि बैक्टीरिया का इंजेक्शन लेने के दो साल बाद तक उन्हें कभी ज़ुकाम-बुखार नहीं हुआ।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सवाल ये उठता है कि वैज्ञानिक कैसे दावा करते हैं कि ये बैक्टीरिया लाखों साल से जिंदा हैं। ये पहले के कीटाणुओं की नई पीढ़ी भी तो हो सकते हैं। मगर, हकीकत ये है कि जहां बर्फीली परत में ये दबे मिले हैं, वहां इनके प्रजनन की कोई गुंजाइश नहीं। अगर किसी तरह इनके डीएनए नई कोशिकाएं बना भी लें, तो उनके लिए वहां जगह ही नहीं। इसीलिए कहा जाता है कि साइबेरिया या अंटार्कटिका में सैकड़ों मीटर बर्फ के नीचे दबे ये कीटाणु लाखों साल से ऐसे ही जिंदा वहां पड़े हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इसी आधार पर कुछ वैज्ञानिक ये दावा करते हैं कि कुछ बैक्टीरिया करोड़ों साल से ऐसे ही बर्फ के नीचे दबे हुए जिंदा हैं। ये बैक्टीरिया, अमेरिका के न्यू मेक्सिको इलाके में 600 मीटर की गहराई में मिलने वाले नमक के क्रिस्टल के भीतर पाए गए हैं। ये उस दौर के हैं जब धरती पर डायनासोर रहते थे। इन कीटाणुओं को खोजने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक, रसेल व्रीलैंड कहते हैं कि ये बिल्कुल वैसे ही बैक्टीरिया हैं जैसे कि आज डेड सी (मृत सागर) में पाए जाते हैं। वहां भी पानी इतना खारा है कि नमक के टुकड़े जैसे जम जाता है। इनमें से कुछ कीटाणुओं को लैब में लाकर रखा गया। ये फिर से एक्टिव होकर बढ़ने लगे थे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैसे जिस 2-9-3 बैक्टीरिया को करोड़ों साल पुराना बताया जा रहा है, उसे कुछ वैज्ञानिक उतना पुराना नहीं मानते। हालांकि रसेल व्रीलैंड अपने दावे पर कायम हैं। वो कहते हैं कि अब तो नमक के टुकड़ों के भीतर, कई जगह इन कीटाणुओं की नई नस्लें पाई गई हैं। ये तीन से पांच करोड़ साल पुराने बताए जाते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी पच्चीस करोड़ साल पुराने बैक्टीरिया के व्रीलैंड के दावे के करीब नहीं पहुंचता। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बेहद मुश्किल माहौल में पड़े इन बैक्टीरिया के पास अपनी नई नस्ल पैदा करने का मौका ही नहीं था। तो ये अपनी जान बचाए, चुपचाप लाखों साल से पड़े हुए हैं। इतने बुरे हालात में भी लाखों बरस जिंदा रहना गैरमामूली बात है। किसी भी जीव को जिंदा रहने के लिए जरूरी है कि उसकी कोशिकाओं को खराब माहौल से जो नुकसान होता है, उसकी मरम्मत होती रहे। मगर जहां ये लाखों साल पुराने बैक्टीरिया मिले हैं, वहां कोशिकाओं की मरम्मत के लिए जरूरी, पानी और दूसरी अहम चीजें उपलब्ध नहीं। फिर ये कैसे जिंदा हैं अब तक?

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैज्ञानिक कहते हैं कि खराब माहौल से सामना होने ही बैक्टीरिया के इर्द-गिर्द एक खोल बन जाता है। इसे स्पोर कहते हैं। ये इतना मजबूत होता है कि एटमी विस्फोट का भी इस पर मुश्किल से असर होता है। 1995 में अमेरिकी वैज्ञानिक राउल कैनो ने एक मक्खी के जीवाश्म के भीतर से निकालकर एक बैक्टीरिया में नई जान फूंक दी थी। ये करीब तीन करोड़ साल पुराने बैक्टीरिया थे। ये मक्खी, एक पेड़ की गोंद के भीतर चिपक गई थी। इसके साथ ही बैक्टीरिया भी वहीं जम गया था।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हालांकि कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि ये स्पोर भी किसी कीटाणु को 25 करोड़ साल नहीं जिंदा रख सकते। इतने सालों में किसी भी जीव का डीएनए टूटकर बिखर जाएगा। वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई भी डीएनए आसमानी बिजली की मार से नहीं बच सकता। किसी खास इलाके में बिजली बार-बार कम ही गिरती है। मगर लाखों साल के दायरे की बात करें, तो धरती के कमोबेश हर हिस्से पर कभी न कभी बिजली गिरी होगी। ऐसे में ये कीटाणु करोड़ों साल से कैसे जिंदा हैं?

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रसेल व्रीलैंड मानते हैं कि नमक के क्रिस्टल के अंदर बैक्टीरिया का जिंदा रहना आसान है, क्योंकि वहां पानी नहीं होता। वहां मौजूद बैक्टीरिया, आसमानी किरणों से ज्यादा मजबूती से निपट सकते हैं। इतने सालों तक किसी कीटाणु के जिंदा रहना इंसानों के लिए अहम साबित हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि हमारी धरती पर जिंदगी किसी और ग्रह, किसी और आकाशगंगा से आई हो, किसी धूमकेतु या उल्कापिंड के जरिए। इसी नजरिए से मंगल ग्रह पर जिंदगी की उम्मीदें भी जगी हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैज्ञानिकों को एक डर भी सता रहा है। उन्हें लगता है कि साइबेरिया या अंटार्कटिका के बेहद सर्द माहौल में कुछ ऐसे बैक्टीरिया या वायरस हो सकते हैं जिनसे इंसानों को नई बीमारी होने का डर हो। कुछ बीमारियों की पुरानी किस्मों के वायरस, बर्फ की परतों में छुपे हो सकते हैं। लेकिन, इससे धरती पर सबसे पुराने जीव की तलाश खत्म नहीं होती। ये बेहद सूक्ष्म जीव, आज की दुनिया पर गहरी और बड़ी छाप छोड़ रहे हैं।  
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