कुछ शोध टीमें बीमारियां फैलने से पहले उसका पता लगाने में इसके इस्तेमाल के बारे में सोच रही हैं, लेकिन आहार के बारे में पता लगाने के लिए इस तरह की जांच अब तक सैद्धांतिक ही थी। आहार और वैध दवाइओं की खपत का पता लगाने के लिए सर्वेक्षणों का इस्तेमाल होता है, लेकिन गटर के पानी का विश्लेषण करके किसी खास जलग्रहण क्षेत्र में उनके औसत उपयोग को मापा जा सकता है।
चोई का कहना है कि सर्वेक्षणों में दवा के इस्तेमाल या भोजन के बारे में पूछने पर लोग कभी-कभी अपनी आदतों को हकीकत से अधिक सेहतमंद बताते हैं। लोग स्वस्थ भोजन की खपत के बारे में ज्यादा और स्नैक्स जैसी चीजों की खपत को कम करके बताते हैं।
ओ'ब्रायन का कहना है कि अपशिष्ट जल का विश्लेषण दो प्रमुख तरीकों से उपयोगी हो सकता है। पहला समुदायों के बीच गैर-बराबरी की पहचान करने में और दूसरा, समय के साथ उन समुदायों में आने वाले बदलावों पर नजर रखने में। 'यदि आप सकारात्मक बदलाव के लिए कुछ लागू करने जा रहे हैं तो आपको उन उपायों की सफलता को मापने में सक्षम होने की जरूरत है।'
शोधकर्ताओं के सामने शुरुआती चुनौती यह थी कि वे क्या परीक्षण कर सकते हैं। गटर के पानी में सिर्फ मल-मूत्र नहीं होता, उसमें पर्सनल केयर उत्पाद, भोजन के टुकड़े, औद्योगिक और व्यावसायिक कचरा भी होता है। शोधकर्ताओं को भोजन के उन जैव संकेतकों को खोजना था जो सिर्फ या प्रमुखता से मानव मल-मूत्र में होते हैं।
अध्ययन में फाइबर की खपत से जुड़े दो जैव संकेतकों का उपयोग किया गया- पहला, पौधों और अनाजों से मिलने वाला और दूसरा खट्टे फलों से मिलने वाला। फाइबर और खट्टे फल, दोनों का सेवन स्वस्थ आहार में शुमार किया जाता है। सामाजिक और आर्थिक तरक्की के पैमानों पर ऊंचे समुदायों में इन दोनों की खपत ज्यादा थी।
मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि अमीर इलाकों में फाइबर और खट्टे फलों से समृद्ध भोजन की खपत ज्यादा थी। उच्च सामाजिक-आर्थिक समूहों में कैफीन का सेवन भी अधिक था, खास तौर पर महंगे किराये वाले इलाकों में।
दूसरे अध्ययनों में भी पुष्टि हुई है कि स्नातक या उससे बड़ी डिग्री वाले लोग एस्प्रेसो और ग्राउंड कॉफी का बार-बार सेवन करते हैं। रिपोर्ट के लेखकों का सुझाव है कि यह रोजाना कॉफी पर खर्च करने की क्षमता और अमीर ऑस्ट्रेलियाइयों में कॉफी पीने की संस्कृति, दोनों वजह से है।
सामाजिक-आर्थिक पैमाने के दूसरे छोर पर खड़े गरीब समुदायों में ट्रामाडोल (दर्दनिवारक), एटेनोलोल (हाई ब्लड प्रेशर की दवा) और प्रेगैबलिन (एंटी-सीजर दवा) जैसी दवाइयों की खपत अधिक थी। इनमें से आखिरी दो दवाइयों की मौजूदगी बूढ़े लोगों में भी ज्यादा होती है, लेकिन ये कम आय से भी जुड़ी हैं। गरीब इलाकों के गटर के पानी में अन्य दर्द निवारक और अवसाद निवारक दवाइयां भी मिलीं, लेकिन उतनी बड़ी मात्रा में नहीं।
चोई का कहना है कि अमीर और गरीब जलग्रहण क्षेत्रों की तुलना चौंकाने वाली हो सकती है। 'हमने जो देखा, सिर्फ उन आंकड़ों को देखिए- एक समुदाय से दूसरे समुदाय की तुलना देखिए- फाइबर के जैव संकेतकों में कई गुणा के अंतर हैं।'
शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि अगली जनगणना में वो ये सर्वेक्षण दोबारा करेंगे। इससे यह पता चल सकेगा कि इस दौरान क्या बदलाव हुए हैं जो दूसरे शोध तरीकों की पकड़ में नहीं आए या जिनकी और जांच की जरूरत है।
मिसाल के लिए, इस अध्ययन में एंटीबायोटिक दवाइयों का इस्तेमाल सभी सामाजिक-आर्थिक हैसियत वाले समूहों में एक जैसा मिला। यह इस बात का संकेत था कि सरकारी सब्सिडी से चल रहा हेल्थकेयर सिस्टम अपना काम कर रहा है।
भविष्य के सर्वेक्षणों में क्या यह वितरण बदलेगा- तब यह अलग शोध का विषय होगा कि किसी समूह में किसी एक दवा की पहुंच कैसे और क्यों कम हो गई। यह अध्ययन सेहत के बारे में एक वैश्विक परिघटना को पुष्ट करता है, जिसे सेहत के सामाजिक अनुपात के रूप में जाना जाता है.यह अच्छी सेहत से जुड़े कारकों को प्रतिबिंबित करता है। जैसे सामाजिक-आर्थिक हैसियत बढ़ने पर धूम्रपान की दर और मोटापे का स्तर बढ़ता है। हालांकि ऑस्ट्रेलियाई अपने देश को समतावादी मानते हैं, लेकिन गटर के पानी की रिपोर्ट में जिस सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी का संकेत मिला है, वह गंभीर है।
2018 की एक रिपोर्ट में पाया गया था कि ऑस्ट्रेलिया में OECD देशों के औसत से ज्यादा गैरबराबरी थी, हालांकि इसकी रैंकिंग ब्रिटेन और अमेरिका से अधिक बराबरी वाले समाज के रूप में है। ऑस्ट्रेलिया में 20 फीसदी शीर्ष आय समूह के व्यक्तियों की आय गरीब समूह के सदस्यों की आमदनी से पांच गुना है।
अधिक पैसे का मतलब है फल और सब्जियां खरीदने की ज्यादा क्षमता, जबकि अधिक शिक्षा का मतलब है कि पोषण के बारे में अधिक समझ। इस अध्ययन में वर्ग और आहार संबंध में एक महत्वपूर्ण अपवाद पाया गया। सामाजिक-आर्थिक पैमानों पर नीचे होने के बावजूद जिन इलाकों में गैर-अंग्रेजी भाषियों की तादाद ज्यादा थी वहां फाइबर और खट्टे फलों की खपत अधिक थी। इससे आप्रवासी लोगों के पारंपरिक खाने में सब्जियों की प्रचुरता का पता चलता है।
विक्टोरिया की डीकिन यूनिवर्सिटी में महामारी विज्ञान की प्रोफेसर कैथरीन बेनेट का कहना है कि क्वींसलैंड का अध्ययन इस तकनीक को अगले स्तर पर ले जाएगा। जनगणना में इसे शामिल करना भी बड़ा कदम है। शोधकर्ताओं को इसकी सीमाओं का पता है। बेनेट कहती हैं, 'महामारी विज्ञान में हम इसे पारिस्थितिकी अध्ययन कहते हैं। हम व्यक्तिगत आंकड़ों का नहीं, सामूहिक आंकड़ों का अध्ययन करते हैं।'
इस तरह के अध्ययनों का इस्तेमाल ऑस्ट्रेलिया में सिगरेट की प्लेन पैकेजिंग शुरू होने के बाद गटर के पानी में निकोटिन की मात्रा कम होने का पता लगाने में किया गया था। 'आप नहीं जानते कि धूम्रपान करने वालों ने सिगरेट पीनी कम कर दी या समाज में धूम्रपान करने वालों की तादाद घट गई।' 'इस तरह के पारिस्थितिकी अध्ययन करने में हमें थोड़ी अतिरिक्त सावधानी रखनी होती है, क्योंकि यह व्यापक समझ से जुड़ी होती है।'
हाल के आहार और दवा अध्ययन की तरह निकोटिन शोध को दूसरे शोधों से तुलना करके मान्यता दी गई थी। इससे यह संकेत मिलता है कि अपशिष्ट जल महामारी विज्ञान व्यापक रूप से सटीक है और यह समुदाय की सेहत और उनकी आदतों पर निगरानी का एक तरीका है। बेनेट कहती हैं, 'यदि हम आंकड़ों की अत्यधिक व्याख्या की कोशिश न करें तो वास्तव में यह एक दिलचस्प अवसर है।' आंकड़े मान्य हो जाने के बाद, वह कहती हैं, 'सामाजिक स्तर पर क्या हो रहा है उसकी नब्ज पर उंगली रखने का यह एक उपयोगी तरीका है।'