विलेज डिफेंस कमेटी (वीडीसी) और कम्युनिटी पुलिसिंग शुरू करने वाले डॉ. वैद दावे से कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर पुलिस देश की सबसे अच्छी और अनुशासित फोर्स है। बावजूद इसके कि उसे आतंकियों और पत्थरबाजों से लड़ने के साथ ही समाज के एक तबके से भी जूझना पड़ता है।
डॉ. वैद का कहना है कि आतंकवाद और अलगाववाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। कारण, एक तो कश्मीरी युवा इसकी हकीकत समझ चुका है। दूसरा अनुच्छेद 370 खत्म होने से इनका हौसला पूरी तरह पस्त हो गया है।
उन्होंने कहा कि केंद्र ने फैसले के बाद संचार नेटवर्क ठप कर बेहतरीन काम किया, क्योंकि इससे पाकिस्तान को कश्मीरी युवाओं में कट्टरता फैलाने का मौका नहीं मिल सका। उन्होंने यह भी कहा कि आतंकियों ने उन पर चार बार हमला किया।
एक हमले में तो उनके एक हाथ की एक अंगुली कट गई। सिर में चोट लगने के कारण ऑपरेशन कराना पड़ा। उनके डीजीपी रहते हुए पहली बार अलगाववादियों पर शिकंजा कसा गया। बाग में एनआईए ने छापेमारी कर अलगाववादियों की कारगुजारियां ही उजागर नहीं की, उनकी गिरफ्तारी भी की।
डीजीपी डॉ. वैद ने बताया कि हिजबुल आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में अशांति फैलाने के लिए पाकिस्तान के ही कहने पर महिला अलगाववादी आसिया अंद्राबी ने बाकायदा महिला पत्थरबाजों की फौज तैयार की थी।
उन्होंने कहा कि इसके लिए महिला कॉलेजों में खासतौर पर टीम बनाई गई थी। पुलिस ने इसमें शामिल छात्राओं को समझाइश भी दी थी। प्राचार्यों और अभिभावकों से बातचीत की। इस तरह धीरे-धीरे महिलाओं की ओर से पत्थरबाजी की घटनाओं पर अंकुश पाने में कामयाबी मिली।
पूर्व डीजीपी ने विशेष बातचीत में कहा कि उन्हें आतंकी अजहर मसूद को कंधार कांड के दौरान छोड़े जाने का मलाल है। उन्होंने कहा कि मैं तब जम्मू—कश्मीर का डीआईजी था। आतंकी अजहर मसूद तब कोट भलवाल सेंट्रल जेल में बंद था।
उसे लेने के लिए दिल्ली से विशेष विमान टेक्निकल एयरपोर्ट आ चुका था। मसूद को वहां तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मुझे ही सौंपी गई थी। डॉ. वैद कहते हैं कि तब दिल पर भारी बोझ लेकर मसूद को एयरपोर्ट तक पहुंचाया था। यह घटना कभी भूलती नहीं है।