पूर्वी चंपारण में भारत और नेपाल की सीमा पर लाल बकेया नदी के किनारे तटबंध बनाने का काम 15 जून से ही रुका हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस दिन नेपाल के सीमावर्ती जिले रौतहट के सीडीओ बसुदेव घिमरे अन्य अधिकारियों और सुरक्षा बलों को लेकर आए थे और वहां काम करा रहे जल संसाधन विभाग, बिहार के इंजीनियर रणबीर प्रसाद को काम रोक देने के लिए कहा। नेपाली प्रशासन का दावा है कि सीमा पर पिलर 346/6 से पिलर 346/7 के बीच तटबंध का निर्माण 'नो मैंस लैंड' पर हुआ है।
बुधवार की दोपहर हम उस जगह पहुंचे जहां तटबंध बनाने का काम रुका हुआ है। नेपाल से आ रही और बागमती में मिलने वाली लालबकेया नदी के किनारे बना यह तटबंध 2.5 किमी लंबा है। जिस जगह पर काम रुक गया है, वहां तटबंध के एक किनारे भारत का गांव बलुआ गुआबाड़ी है, दूसरे किनारे पर है नेपाल का बंजराहा गांव।
भारत का गांव तटबंध से ज्यादा सटा है। कुछ घरों के दरवाजे भी तटबंध पर ही खुलते हैं। कुछ घरों के मवेशी भी तटबंध पर बंधे मिलते हैं। दूसरी तरफ नेपाल का गांव बंजराहा सीमा से कुछ दूरी पर है। दुकानें और मकान भी नो मैंस लैंड से करीब 25 मीटर दूर है।
नियमों के मुताबिक, सीमा रेखा से 9.1 मीटर दाहिने और 9.1 मीटर बाएं की जमीन को नो मैंस लैंड कहा जाता है। सीमारेखा पर पिलर गड़े हैं, लेकिन जिस जगह पर नेपाल की तरफ से दावा किया गया है वहां के पिलर अपनी जगह पर नहीं है। पूर्वी चंपारण के डीएम शीर्षत कपिल अशोक कहते हैं, 'नेपाली प्रशासन की आपत्ति के बाद स्थानीय स्तर पर ज्वाइंट सर्वे का कराया गया था। उसपर सहमति भी बन गई थी, लेकिन फिर लॉकडाउन हो गया। लॉकडाउन के बाद पुनः जब काम शुरू किया गया तो उन्होंने फिर से आपत्ति जताई। लिहाजा काम रोकना पड़ा।'
नेपाल के दावे के मुताबिक क्या तटबंध का निर्माण 'नो मैंस लैंड' में हुआ है?
डीएम शीर्षत कपिल अशोक ने कहा 'इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। अब यह सर्वे के बाद ही क्लियर हो पाएगा।' हालांकि, शुरुआत में स्थानीय स्तर पर जो सर्वे कराया गया था, उसके बाद पिलर की जगह पहचान के लिए जो बांस का खूंटा गड़ा था, उसकी दूरी तटबंध से 9.1 मीटर से कम थी।
बांस के खूंटे को दिखाते हुए गुआबाडी के लक्ष्मी ठाकुर कहते हैं, 'यहां से नाप लीजिए 10 गज। इसी में से दो गज कम या ज्यादा होगा। किसी साल बाढ़ आई होगी और पिलर इधर-उधर हो गया होगा। गांव के लोगों की जमीन होती तो अब तक मामला खत्म हो गया होता। पर यह देशों का मामला है।'
वैसे तो इस वक्त नेपाल में प्रवेश की मनाही है, मगर हमें सीमा पर भारत के लोगों से बात करते हुए देखकर नेपाल के बंजराहा गांव की तरफ बाजार में बैठे लोगों ने इशारे से बॉर्डर के उस पार बुला लिया। वे लोग भारत के लोगों के साथ अपने संबंधों पर बातचीत करने लगे। उनका आरोप था कि भारत की मीडिया नेपाल का पक्ष सही से नहीं रख रही है।
हमने उनका पक्ष जानना चाहा तो बंजराहा के मुखिया बिगु साह बताते हैं, 'वे अपना बांध बनाएं, हमें उससे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन उन्हें इस बात का भी ख्याल रखना होगा कि बरसात में जब पानी हमारी ओर बढ़ जाएगा तब हमलोग क्या करेंगे, कहां जाएंगे?'
बिगु साह आगे कहते हैं, 'सहमति बनी थी कि पानी रिलीज करने के लिए तटबंध में दो चैनल बनेंगे, लेकिन एक भी चैनल नहीं बनाया गया। ऊपर से इतना ऊंचा बांध बना लिया गया। अब यदि बरसात होती है तो सोचिए कि हमारा क्या हाल होगा।'
सहमति बनने और चैनल बनाए जाने की बात मोतिहारी के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण पांडेय भी कहते हैं। उन्होंने कहा, 'स्थानीय स्तर पर जब सर्वे कराया गया था तब जमीन को लेकर सहमति बन गई थी। लेकिन उस सहमति में एक और बात ऑन रिकॉर्ड थी, वो थी पानी के प्रवाह के लिए चैनल बनाना। लेकिन बांध तो बन गया पर चैनल नहीं बना। मेरी समझ से नेपाल को सबसे ज्यादा आपत्ति इसी से है और गुआबाडी में पिलर मिसिंग हो जाने से उन्हें एक प्वाइंट मिल गया।'
पहली बार दावा
तटबंध की मरम्मत का काम बाढ़ पूर्व की तैयारियों के तहत किया जा रहा था। बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मंत्री संजय कुमार झा ने सोमवार को बयान दिया कि नेपाल की तरफ से इस तरह की आपत्ति न सिर्फ एक बल्कि तीन तटबंधों की मरम्मत और निर्माण के काम में दर्ज कराई गई है।
चूंकि तटबंधों की मरम्मत का काम हर साल बाढ़ पूर्व की तैयारियों में शामिल होता है, लेकिन नेपाल की की तरफ से ऐसी आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई और ना ही ऐसा कोई कदम कभी उठाया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछली बार भी नेपाल की तरफ से ऐसे दावे किए गए थे, मगर तब स्थानीय स्तर के अधिकारियों ने ही बात करके मसले को सुलझा लिया था।
बगल के सीमावर्ती गांव चंदनबारू के रहने वाले अकरम कहते हैं, 'इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि नेपाल ने इतना सख्त कदम उठाया हो। यह तटबंध काफी पहले बना था और बाढ़ पूर्व हर साल मरम्मत का काम चलता है।' अकरम के मुताबिक, नेपाल की असल नाराजगी बांध बन जाने और चैनल नहीं बनाए जाने से ही है, क्योंकि उन्हें बाढ़ का खतरा सताने लगा है। पिछली बार की बाढ़ में पूरा इलाका जलमग्न हो गया था। हो सकता है कि तटबंध बन जाने से भारत की तरफ के लोगों को राहत मिल जाए, मगर चैनल नहीं बनने से नेपाल की तरफ के लोगों की परेशानियां बढ़ जाएंगी।
लेकिन बांध बना क्यों नहीं? जवाब में डीएम शीर्षत कपिल कहते हैं, 'चैनल बनाने की जिम्मेदारी जल संसाधन विभाग, उसके इंजीनियर और ठेकेदारों की थी। लॉकडाउन की वजह से काम बंद हो जाने के कारण चैनल का काम पूरा नहीं हो पाया।'
नेपाल की तरफ के लोगों ने बातचीत के दौरान चाय भी पिलाया और बहुत सारी बातें भी कीं। पर जैसे ही हमने उन्हें रिकॉर्ड करने के लिए कैमरा और माइक निकाला, नेपाली प्रहरी के सैनिकों ने आकर रोक दिया। उन्होंने अपने लोगों को चुप रहने को कहा और हमसे कहा, 'आप चाय पीकर लौट जाइए।'