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धरती की वो अद्भुत जगह, जहां लाखों साल पहले घूमते थे डायनासोर

Mon, 30 Dec 2019 04:49 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अंटार्कटिका दुनिया का ऐसा गैर आबाद हिस्सा है, जहां बर्फ ही बर्फ है। यहां सूरज की रोशनी ना के बराबर पहुंचती है, लेकिन रिसर्च बताती हैं कि अंटार्कटिका हमेशा से ऐसा नहीं था। एक दौर था, जब यहां घने जंगल थे। उन जंगलों में बड़े-बड़े डायनासोर घूमा करते थे। इस बात से साफ जाहिर है कि यहां इतनी गर्मी रहती थी जो डायनासोर के जिंदा रहने के लिए जरूरी थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि यहां के जंगल साफ हो गए और तमाम डायनासोर खत्म हो गए। इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें धरती के इतिहास के पन्ने पलटने होंगे।
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अंटार्कटिका - फोटो : Pixabay
बताया जाता है कि अब से करीब 145 से 66 लाख साल पहले तक यहां बर्फ नाम के लिए भी नहीं थी। हालांकि इतने वर्ष पहले की बात सुनने में अटपटी लगती है लेकिन शोधकर्ताओं को यहां बर्फ में दबे डायनासोर के जो जीवाश्म मिले हैं, वो इसी दौर की तरफ इशारा करते हैं। यही वो दौर था, जब तमाम डायनासोर खत्म हो गए। बताया जाता है इस दौर में एक उल्कापिंड धरती से टकराया था और उसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। भू-विज्ञान में इसे क्रिटेशियस महायुग कहते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ये वो दौर था जब धरती से बड़े से बड़े जानवर विलुप्त हो गए। पहाड़ों की बर्फ पिघल कर समंदर में आ गई। समंदर का जलस्तर और दायरा अपनी इंतिहा तक बढ़ गए। दावा तो ये भी है कि हिंद महासागर का निर्माण इसी दौर में हुआ था। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर शोधकर्ताओं को ऐसे पेड़ और रेंग कर चलने वाले जानवरों के जीवाश्म मिले हैं, जिनके जिंदा रहने के लिए सूरज की गर्मी जरूरी है। विज्ञान की भाषा में इन्हें कोल्ड ब्लडेड रेप्टाइल्स यानी सर्द खून वाले जीव कहा जाता है। इनका शरीर भले ही बाहर के तापमान के अनुसार अपने शरीर का तापमान संतुलित कर लेता है, लेकिन इन्हें सूरज की रोशनी और गर्मी चाहिए। आज भी हम तमाम तरह के रेंगने वाले जानवरों को धूप सेंकते देखते हैं। इसी बुनियाद पर कहा जाता है कि कभी यहां सूरज की पर्याप्त रोशनी रही होगी।

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अंटार्कटिका - फोटो : Pixabay
रिसर्च करने वालों ने उस दौर की आबो-हवा का अंदाजा लगाने के लिए महासागर में रहने वाले जीवों के जीवाश्मों के खोल पर भी अध्ययन किया। इसके जरिए उन्होंने पता लगाने की कोशिश की कि किस समय अंतराल पर धरती और समंदर के तापमान में कितना बदलाव आया। कितने जानवर उस बदलाव के हिसाब से खुद को ढाल सके। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
समुद्र पर की जा रही रिसर्च को फोरामिनिफेरा कहा जाता है। डॉ.ब्रायन ह्यूबर का कहना है कि इस रिसर्च में समुद्र की गहराई और ऊपरी सतह पर रहने वाले जीव-जंतुओं और समुद्र के तापमान पर रिसर्च की जाती है और इस रिसर्च में बहुत दिलचस्प बातें सामने आई हैं। दरअसल समुद्र पर की गई रिसर्च से ही धरती की जलवायु बनने की सही तस्वीर उभर कर सामने आती है। 
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अंटार्कटिका - फोटो : Pixabay
डॉ. ह्यूबर का कहना है कि अंटार्कटिका का उत्तरी हिस्सा काफी गर्म होता था। यहां गर्मी का ये माहौल शायद उस दौर में बना जब धरती पर अचानक तापमान बढ़ा और सारी बर्फ पिघल गई। इस दौर को वैज्ञानिक क्रिटेशियस हॉट हाउस कहते हैं। ये एक खास तरह का ग्रीन हाउस इफेक्ट है, जिसमें वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। इसी दौर में समुद्र का दायरा ज्यादा तेजी से बढ़ा। बढ़ते तापमान की वजह से ही ज्वालामुखियों में भी हलचल बढ़ी और उससे भी कार्बन डाई ऑक्साइड तेजी से बाहर निकली। 
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अंटार्कटिका - फोटो : Social media
हालांकि ह्यूबर और उनके साथी अभी ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या वाकई ज्वालामुखी से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड और हॉट हाउस इफेक्ट की वजह से धरती का तापमान इतना बढ़ा कि दुनिया भर की बर्फ पिघल गई और बहुत सी नस्लें खत्म हो गईं। ये हम सब जानते है कि धरती पर जलवायु-परिवर्तन होता रहता है, हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। फिर भी क्रिटेशियस महायुग और आज के दौर में फर्क क्या है। क्या आज के जलवायु परिवर्तन से अंटार्कटिका बर्फ की कैद से आजाद हो पाएगा। ये बड़ा सवाल है।
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अंटार्कटिका - फोटो : Pixabay
डॉ. ह्यूबर का कहना है कि आज हम एक दशक में सैकड़ों लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड माहौल में पैदा कर रहे हैं। इतने कम समय में इतनी ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड तो ज्वालामुखी भी माहौल को नहीं दे सकते। फिर भी ग्लेशियर पिघलाने के लिए इतनी गर्मी काफी नहीं है। हो सकता है फिलहाल तमाम बर्फ ना पिघले, लेकिन भविष्य में यकीनन पिघल जाएगी। इस बात के संकेत मिलने भी लगे हैं। पश्चिम अंटार्कटिका के ग्लेशियर पिघलने शुरू हो चुके हैं। भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि जितनी जल्दी समुद्र में पानी का स्तर बढ़ेगा उतनी ही जल्दी ग्लेशियरों की बर्फ पिघलेगी। हो सकता है कि इसके लिए इंतजार थोड़ा लंबा हो जाए, लेकिन जमीन के इस हिस्से को बर्फ से मुक्ति जरूर मिल जाएगी। इंसान के लिए तब भी वहां रह पाना मुमकिन होगा या नहीं कहना मुश्किल है। 
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