बिहार में चुनावी रण शुरू हो चुका है। एक तरफ भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए है और उसका मुकाबला महागठबंधन से है, जिसमें राजद और कांग्रेस के साथ-साथ सभी वामदल शामिल हैं। हकीकत यह है कि प्रदेश में वोटों का बिखराव रोकने और एनडीए को हराने के लिए ये सभी दल एक छतरी के नीचे आ गए हैं। ऐसे में महागठबंधन की पहली रैली में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और राजद नेता तेजस्वी यादव एक मंच पर नजर आए, लेकिन पिछले साल लोकसभा चुनाव में मोदी विरोध का चेहरा बने कन्हैया कुमार इन सभाओं में नहीं दिखे। दरअसल, कन्हैया बिहार चुनाव में सीपीआई के स्टार प्रचारक हैं, लेकिन महागठबंधन के दल ही उनसे परहेज कर रहे हैं और चुनावी मंच पर भी उनकी आवाज सुनाई नहीं दे रही है।
राजद प्रवक्ता ने कहा- सब एकजुट हैं
इस संबंध में राजद के वरिष्ठ नेता और प्रदेश प्रवक्ता चितरंजन गगन कहते हैं कि राज्य में चुनाव तीन चरणों में होना है। ऐसे में समय बेहद कम है। अगर सभी सभाओं में सारे नेता जुटने लगे तो हमसे कई विधानसभा क्षेत्र अछूते रह जायेंगे। सच्चाई तो यह है कि महागठबंधन के सभी नेता अलग-अलग समूहों में बंटकर सभा कर रहे हैं। कोई किसी की उपेक्षा नहीं कर रहा। हम सब एकजुट हैं।”
सीपीआई के मीडिया प्रभारी ने दी यह जानकारी
इस मसले पर सीपीआई (माले) के मीडिया प्रभारी परवेज ने कहा कि राजद प्रदेश और महागठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी है। साथ ही, वह सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव भी लड़ रही है। ऐसे में उसके नेता का केंद्र में ज्यादा बने रहना स्वाभाविक है। कोई किसी से परहेज नहीं कर रहा। सभी अपनी-अपनी जगह पर चुनावी तैयारियों में लगे हैं। कन्हैया कुमार के साथ भी ऐसा ही है। उन्होंने 23 अक्टूबर को बेगूसराय में चुनावी सभा की थी।”
कन्हैया की गैरमौजूदगी पर कई सवाल?
राजद के इस जवाब को स्वाभाविक माना जा सकता है, लेकिन चुनाव के हाईटाइम में कन्हैया कुमार का मंच से नदारद रहना बड़ा सवाल उठाता है। दरअसल, पिछले लोकसभा चुनाव के अनुभव के आधार पर आम लोगों के बीच चर्चा है कि महागठबंधन के बड़े दल (राजद-कांग्रेस) कन्हैया कुमार को पर्दे के पीछे या किसी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रखना चाहते हैं। इन दलों का मानना है कि कन्हैया कुमार कुशल वक्ता हैं और वो अपनी बातों के जरिये आम लोगों से अच्छा संवाद बना लेते हैं। महागठबंधन के बड़े दलों के नेता उनके इस कौशल से परिचित भी हैं।
लोकसभा चुनाव में छा गए थे कन्हैया कुमार
गौरतलब है कि साल 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और लहर के बीच कन्हैया कुमार ने बेगूसराय में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई थी। उस वक्त कन्हैया की छवि एक राष्ट्रीय नेता के रूप में बनी थी। उस वक्त सीपीआई प्रत्याशी कन्हैया के खिलाफ राजद भी मैदान में था।
अपने ही नेताओं से परहेज कर रहे वामदल!
चुनावी रैलियों में सिर्फ कन्हैया कुमार ही नदारद नहीं है, बल्कि महागठबंधन का एक घटक सीपीआई (माले) राजद के साथ साझा चुनावी सभा तो कर रहा है, लेकिन बाकी वामदलों और उनके नेताओं से परहेज कर रहा है। ताजा उदाहरण पालीगंज विधानसभा क्षेत्र का है। यहां पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आईसी घोष को सीपीआई (माले) प्रत्याशी सुमन सौरभ के प्रचार में जाना था, लेकिन वह इंतजार ही करती रह गईं। आपको बता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव में वामदलों ने कुल 29 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इनमें सीपीआई (माले) के 19, सीपीआई के छह और सीपीएम के चार प्रत्याशी शामिल हैं।
क्या तेजस्वी की वजह से साइडलाइन हैं कन्हैया?
अहम बात यह है कि बिहार चुनाव में हालात बदल गए हैं। एनडीए को रोकने के लिए वामदल के सभी घटक एक हुए हैं और उन्होंने तेजस्वी यादव को अपना नेता भी मान लिया है। ऐसे में रोजाना हो रही चुनावी सभाओं से कन्हैया का नदारद रहना इस बात की ओर इशारा करता है कि तेजस्वी को कन्हैया आज भी स्वीकार्य नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कन्हैया का सवर्ण जाति का होना और उनकी प्रगतिशील सोच तेजस्वी के भय का सबसे बड़ा कारण हो सकती है। इसी वजह से महागठबंधन के बड़े दल उनके साथ मंच साझा करना नहीं चाह रहे। जाहिर है तेजस्वी यादव अपने समीकरण के अनुरूप उनके साथ को अपने राजनीतिक स्वास्थ्य के संदर्भ में अनफिट और हानिकारक मानते हों और उनसे दूरी बनाये रखने में ही अपना भविष्य उज्जवल पाते होंगे। इन तमाम मतभेदों उपेक्षाओं के बीच कन्हैया कुमार अपनी पार्टी सीपीआई के लिए 27 और 29 अक्टूबर को चुनावी सभा करेंगे। अब देखना यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव के बाद महागठबंधन के बड़े दल और उसके नेता चुनाव परिणाम आने के बाद वामदलों को कितना तवज्जो देते हैं या यही दूरी बनाये रखते हैं।