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अगर इसे नहीं रोका गया तो अगले चुनाव तक गंगा में समा जाएगा गांव

Fri, 09 Oct 2015 05:58 PM IST
सलमान रावी
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ईस्माइलपुर है तो प्रखंड मुख्यालय मगर प्रखंड के कार्यालय पर महीनों ताला लगा रहता है। ना अधिकारी, ना कर्मचारी। यहाँ कोई आना नहीं चाहता। इसका कारण भी है। वो कारण है गाँव तक कोई सड़क ही नहीं है।
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हर साल गंगा नदी इलाके की सैकड़ों एकड़ जमीन काट ले जाती है। गंगा के किनारे बसा यह गाँव अब पता नहीं कितने दिनों तक और बचेगा। ईस्माइलपुर के ग्रामीण बताते हैं कि पिछले पांच सालों में गँगा नदी रास्ता बदलकर एक किलोमीटर तक अन्दर आ गई है।

जो लोग यहाँ एकड़ दर एकड़ जमीन के मालिक हुआ करते थे, आज झोपड़ी में रहते हैं और दूसरों के खेतों में मजदूरी कर अपना गुजारा करते हैं। बिहार में पहले और दूसरे चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार का अभियान अपने पूरे शबाब पर है। एक बार फिर वादों का दौर भी शुरू हुआ है।
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मगर भागलपुर से 25 किलोमीटर दूर गोपालपुर के ईस्माइलपुर के रहने वाले ग्रामीण इस बार इस पूरी चुनावी प्रक्रिया का बहिष्कार कर रहे हैं। यहाँ के मुखिया मंतलाल शर्मा जो गीत गाते हैं वो सिर्फ बहिष्कार का नहीं बल्कि गांववालों की भावनाओं को उजागर करता है। उनके गीत के बोल हैं, "यहाँ से सब दिन नेता जितके दिल्ली पटना घूमय गे।।। महल अटारी देस बिदेस में अपना खूब बनलका्य गे ....अपना सब से वादा करके खूब वादा टल गए गे..."

सवाल है कि आखिर प्रखंड विकास अधिकारी और उनके मातहत कितनी बार अपने दफ्तर आते हैं? इस पर उनका कहना था चूँकि सड़क नहीं है और उनकी गाड़ी यहाँ तक नहीं आ सकती इसलिए वो नवगछिया से ही काम करते हैं।

नवगछिया ईस्माइलपुर से 11 किलोमीटर की दूर है। गाँव के मुखिया मनोहर कुमार का कहना था कि इस पूरे इलाके को गंगा नदी के कटाव का शिकार होना पड़ा है।
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'न डॉक्टर न दवाई'

मनोहर कुमार कहते हैं, "जिन लोगों की जमीनें गई हैं उन्हें आज तक कुछ नहीं मिला। वो दूसरे गाँव वालों के रहमो करम पर जी रहे हैं। जो कभी एकड़ के एकड़ जमीनों के मालिक थे, आज खाक पति हैं।"

अब यहाँ के लोग इस विधानसभा चुनाव के बहिष्कार का मन बना चुके हैं। अब वो ना तो प्रचार की गाड़ियों को आने देते हैं और ना ही किसी नेता की सभा में खुद ही जाते हैं।

सरपंच मंतलाल शर्मा कहते हैं कि पिछले कई दशकों से ग्रामीणों ने सिर्फ वादे सुने। गाँव में ना तो डाक्टर आता है ना दवाई। वो कहते हैं, "एम्बुलेंस भी नहीं आ सकती क्योंकि सड़क ही नहीं है। किसी तरह चारपाई पर लोगों को लादकर ले जाना पड़ता है।"

पिछले पांच सालों में गंगा नदी एक किलोमीटर अन्दर आ चुकी है। गाँव के लोगों को अंदेशा है कि कहीं अगले विधानसभा के चुनावों के आने तक इस प्रखंड मुख्यालय का नाम ओ निशाँ ही खत्म हो जाए। इनके सामने जिन्दगी और मौत का संघर्ष है और इसलिए इस बार गाँव के लोगों ने कमर कस ली है। इस बहिष्कार का कितना असर हो पायेगा, यह तो बस वक्त ही बताएगा।
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