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बिहार: गोपालगंज में बाढ़ का पानी उतरा, लेकिन मुसीबतें नहीं; कीचड़, दुर्गंध और तबाही के बीच घर लौट रहे पीड़ित

Wed, 07 Oct 2026 03:49 PM IST
सारण ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोपालगंज

सार

गोपालगंज में बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब प्रभावित परिवारों के सामने उजड़े घर और बर्बाद गृहस्थी को दोबारा बसाने की चुनौती है। गांवों में कीचड़, दुर्गंध और दूषित पानी से बीमारी का खतरा बढ़ गया है, जबकि प्रशासन के सामने जनजीवन को सामान्य करने की बड़ी चुनौती है।
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घर लौटते बाढ़ पीड़ित।
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विस्तार
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गोपालगंज में बाढ़ की विभीषिका झेलने के बाद अब नदियां धीरे-धीरे शांत हो रही हैं और जलस्तर नीचे गिर रहा है, लेकिन प्रभावित इलाकों में लोगों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बाढ़ का पानी तो उतर गया है, लेकिन अपने पीछे तबाही का ऐसा मंजर छोड़ गया है, जिसे देखकर प्रभावितों के आंसू नहीं थम रहे। घरों में पानी से खराब हुआ सामान, गलियों और आंगन में चारों तरफ जमा कीचड़ तथा दुर्गंध ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है।

तटबंधों, बांधों और राहत शिविरों में कई दिन गुजारने के बाद बाढ़पीड़ित अब अपने-अपने घर लौट तो रहे हैं, लेकिन उनके सामने उजड़े आशियानों को दोबारा बसाने की बहुत बड़ी चुनौती खड़ी है। लोगों की आंखों में अपने घर को फिर से संवारने की उम्मीद तो है, लेकिन बाढ़ में बर्बाद हुए गृहस्थी के सामान, पूरी तरह नष्ट हुई फसलों और क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत में कितना समय और पैसा लगेगा, यह सवाल उनके जेहन में कौंध रहा है।

सामान्य जनजीवन बहाल करना प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा

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जलस्तर घटने के साथ ही प्रभावित गांवों में सामान्य जनजीवन को वापस पटरी पर लाना स्थानीय प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस समय बाढ़पीड़ितों को मुख्य रूप से चार बुनियादी जरूरतों की सख्त दरकार है। बाढ़ के कारण पेयजल स्रोत दूषित हो चुके हैं। ग्रामीणों को हैजा और पेट संबंधी बीमारियों से बचाने के लिए स्वच्छ पानी और सूखा राशन पहुंचाना पहली प्राथमिकता है।

जमा कीचड़ और जलजमाव से संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। हालांकि, स्थिति को संभालने के लिए मेडिकल टीमें प्रभावित क्षेत्रों में गांव-गांव पहुंच रही हैं और शिविर लगाकर लोगों की जांच कर रही हैं। रास्तों पर जमे भारी कीचड़ और जलजमाव के कारण संपर्क मार्ग टूटे हुए हैं, जिससे राहत सामग्री पहुंचाने में भी बाधा आ रही है। इंसानों के साथ-साथ मवेशियों के सामने भी भुखमरी का संकट पैदा हो गया है, क्योंकि हरा चारा पूरी तरह सड़ चुका है।

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उम्मीद और संघर्ष के बीच बीती रातें

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स्थानीय निवासियों का कहना है कि पानी भले ही कम हो गया हो, लेकिन असली जंग अब शुरू हुई है। घर के अंदर रखी हर कीमती चीज, चाहे वह अनाज हो, कपड़े हों या इलेक्ट्रॉनिक सामान, सब कुछ जलमग्न होकर बर्बाद हो चुका है। मिट्टी के घर ढह चुके हैं और पक्के मकानों की दीवारों में दरारें आ गई हैं।

फिलहाल, पीड़ित परिवार खुद ही फावड़े और बाल्टियां लेकर अपने घरों से कीचड़ निकालने में जुटे हैं। प्रशासन और समाजसेवी संगठन राहत कार्यों में लगे जरूर हैं, लेकिन नुकसान का दायरा इतना व्यापक है कि स्थिति को पूरी तरह सामान्य होने में लंबा वक्त लगेगा। बाढ़पीड़ित अब सरकार से त्वरित मुआवजा और पुनर्वास सहायता की उम्मीद लगाए बैठे हैं, ताकि वे अपनी जिंदगी की नई शुरुआत कर सकें।

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