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Bihar: कमजोर नवजात शिशुओं के लिए वरदान बनी सिवान सदर अस्पताल की SNCU इकाई, जानें क्या खास

Sun, 25 May 2025 06:20 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीवान

सार

Bihar: कम वजन वाले नवजातों के अलावा बर्थ एस्फिक्सिया, निमोनिया, पीलिया, रक्त संक्रमण, प्रसव के समय गंदगी निगलने वाले शिशु और जन्म के तुरंत बाद ऑक्सीजन लेवल कम होने जैसी स्थितियों वाले बच्चों को भी एसएनसीयू में एडमिट किया जाता है। जिन शिशुओं में जन्म के एक मिनट के भीतर रोने की प्रतिक्रिया नहीं होती है, उन्हें बर्थ एस्फिक्सिया की श्रेणी में रखते हुए प्राथमिकता के आधार पर इलाज दिया जाता है।
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सीवान मॉडल अस्पताल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गर्भावस्था के दौरान यदि महिलाओं की समुचित जांच और इलाज नहीं हो सके या उन्हें पर्याप्त पोषण न मिले, तो जन्म लेने वाले शिशु अक्सर कमजोर होते हैं और कई बीमारियों से ग्रसित पाए जाते हैं। ऐसे नवजातों को जन्म के बाद तुरंत विशेष इलाज और देखभाल की आवश्यकता होती है। सिवान स्थित मॉडल सदर अस्पताल परिसर में संचालित स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) ऐसे ही बच्चों के इलाज के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रही है।

सिविल सर्जन डॉ. श्रीनिवास प्रसाद ने बताया कि एसएनसीयू में न केवल सरकारी अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चों का इलाज किया जाता है, बल्कि जिले के अन्य निजी अस्पतालों में जन्मे कमजोर नवजातों को भी यहां लाकर बेहतर चिकित्सा सेवाएं दी जाती हैं। अगर किसी बच्चे की स्थिति एसएनसीयू में मौजूद संसाधनों से संभालने लायक नहीं होती है, तो उसे तत्परता से पटना के किसी उच्च संस्थान में रेफर कर दिया जाता है। इससे एसएनसीयू में इलाज करवाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और जिले के अधिक से अधिक जरूरतमंद परिवार इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।

यहां इलाज के दौरान नवजात शिशुओं को सभी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह निःशुल्क दी जाती हैं। एसएनसीयू से डिस्चार्ज होने के बाद बच्चों का एक सप्ताह के भीतर पहला फॉलोअप किया जाता है। इसके बाद तय अंतराल पर फॉलोअप जारी रहता है, और एक साल के भीतर अधिकतम पांच बार फॉलोअप सुनिश्चित किया जाता है, ताकि बच्चे के स्वास्थ्य की निगरानी बनी रहे।

सदर अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अनिल कुमार सिंह ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त चिकित्सकीय देखभाल न मिलने की वजह से कई बार नवजात शिशु अत्यंत कम वजन के साथ जन्म लेते हैं और उन्हें सांस लेने में परेशानी, शरीर का सामान्य तापमान बनाए रखने में असमर्थता (हाइपोथर्मिया), या ब्लड शुगर की कमी (हाइपोग्लाइसीमिया) जैसी समस्याएं होती हैं। ऐसे बच्चों को तुरंत एसएनसीयू में भर्ती कर विशेषज्ञों की देखरेख में इलाज शुरू किया जाता है।

डॉ. सिंह ने बताया कि कम वजन वाले नवजातों के अलावा बर्थ एस्फिक्सिया, निमोनिया, पीलिया, रक्त संक्रमण, प्रसव के समय गंदगी निगलने वाले शिशु और जन्म के तुरंत बाद ऑक्सीजन लेवल कम होने जैसी स्थितियों वाले बच्चों को भी एसएनसीयू में एडमिट किया जाता है। जिन शिशुओं में जन्म के एक मिनट के भीतर रोने की प्रतिक्रिया नहीं होती है, उन्हें बर्थ एस्फिक्सिया की श्रेणी में रखते हुए प्राथमिकता के आधार पर इलाज दिया जाता है। इस इकाई में कार्यरत शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. कालिका सिंह, डॉ. पंकज कुमार सिंह और डॉ. उमेश कुमार गुप्ता बच्चों के इलाज में सतत रूप से लगे रहते हैं।

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एसएनसीयू की प्रभारी जीएनएम शोभा कुमारी ने जानकारी दी कि अप्रैल 2022 से अब तक कुल 2924 नवजात शिशुओं का सफल इलाज कर उन्हें घर भेजा गया है। इनमें वित्तीय वर्ष 2022-23 में 687, 2023-24 में 1167, 2024-25 में अब तक 933 बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा अप्रैल 2025 में 77 और मई महीने में अब तक 60 नवजातों का इलाज हो चुका है।

शोभा कुमारी ने बताया कि एसएनसीयू में इलाज के लिए सभी जरूरी संसाधनों की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। फिलहाल यहां 12 वार्मर, 2 सी-पैप मशीनें, 4 फोटोथैरेपी यूनिट और 6 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध हैं। साथ ही नवजातों की देखभाल के लिए 24 घंटे आठ प्रशिक्षित जीएनएम - अंजली कुमारी, पुष्पा कुमारी, निधि कुमारी, प्रीति रानी, राज नंदिनी, इंद्राणी, सरिता कुशवाहा और संगीता कुमारी की सेवाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा तीन शिशु रोग विशेषज्ञ रोस्टर के अनुसार हर दिन मौजूद रहते हैं। ओपीडी अवधि में दो चिकित्सक नियमित रूप से एसएनसीयू वार्ड में रहकर बच्चों की जांच और इलाज करते हैं, जबकि गंभीर स्थिति में नोडल चिकित्सक और एसएनसीयू इंचार्ज कभी भी उपस्थित होकर आवश्यक चिकित्सा सहायता प्रदान करते हैं।

इन सभी व्यवस्थाओं और समर्पित चिकित्सा टीम की वजह से जिले के कमजोर और बीमार नवजात शिशुओं का बेहतर इलाज संभव हो सका है। एसएनसीयू में भर्ती अधिकांश बच्चों को समय पर इलाज देकर पूरी तरह स्वस्थ करके उनके परिवारों को सौंपा जा रहा है।

सिवान सदर अस्पताल की एसएनसीयू आज जिले के हजारों नवजातों के लिए जीवन रक्षक बन चुकी है और इसकी उपलब्धियां यह साबित करती हैं कि समय पर समर्पित प्रयास और बेहतर संसाधनों से नवजात मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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