बिहार सहित सारण जिले में चुनावी समीकरण मजबूत करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता अपनी अपनी गोटी सेट करने में लगे हुए हैं। लेकिन इसका अंतिम निर्णय पार्टी को ही लेना है। इसी कड़ी में जिले के विभिन्न विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशी क्षेत्र को छोड़ कर पार्टी कार्यालयों या अपने आका के पास मंडरा रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा जिले की मांझी विधानसभा सीट पर आगामी चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। क्योंकि यह सीट राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, जहां जातिगत समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस बार राजद के सामने उम्मीदवार चयन को लेकर बड़ा असमंजस है। पार्टी को यह तय करना है कि ब्राह्मण मतदाताओं को साधा जाए या फिर परंपरागत यादव- मुस्लिम (MY) समीकरण को मजबूती दी जाए।
मांझी सीट पर ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। यदि राजद इस वर्ग से किसी प्रभावशाली चेहरे को टिकट देती है तो यह भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंधमारी कर सकती है। ऐसे में पूर्व विधान परिषद प्रत्याशी सुधांशु रंजन पाण्डेय का नाम चर्चा में है। सुधांशु पाण्डेय को राजद का मजबूत ब्राह्मण चेहरा माना जाता है और स्थानीय स्तर पर उनकी अच्छी पकड़ भी है। यदि उन्हें टिकट दिया जाता है तो भाजपा के कट्टर समर्थक ब्राह्मण मतदाताओं को राजद की ओर झुकाने में मदद मिल सकती है।
युवा वर्ग और महिलाओं के बीच चंदा देवी की लहर
हालांकि वहीं दूसरी ओर भोजपुरी फिल्मों के चर्चित कलाकार खेसारी लाल यादव की पत्नी चंदा देवी का नाम भी सुर्खियों में आ रहा है, यदि राजद उन्हें अपना उम्मीदवार बनाती है तो निश्चित रूप से यादव और मुस्लिम समुदाय में भारी उत्साह देखने को मिल सकता है। MY समीकरण पर हमेशा से भरोसा करने वाली राजद के लिए यह कदम पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखने में कारगर हो सकता है। खासकर युवा वर्ग और महिलाओं के बीच चंदा देवी का नाम आते ही क्षेत्र में नए तरह की ऊर्जा दिख रही है, क्योंकि चंदा देवी का मायका मांझी प्रखंड मुख्यालय स्थित होने लाभ मिलने की संभावना है।
ब्राह्मण वोटरों में सेंधमारी
मांझी विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण का मतदाता सर्वाधिक होने के कारण किसी ब्राह्मण यानि राजद नेता सह विधान परिषद के पूर्व प्रत्याशी सुधांशु रंजन पाण्डेय को अगर राजद टिकट देती है तो निश्चित रूप से राजग गठबंधन (भाजपा) के कट्टर समर्थक माने जाने वाले ब्राह्मण वोटरों में सेंधमारी हो सकती है। हालांकि वही दूसरी तरफ अगर भोजपुरी लोक कलाकार खेसारी लाल यादव की पत्नी चंदा देवी को राजद का टिकट मिलता है तो निश्चित रूप से यादव और मुस्लिम (माय) समीकरण मजबूत होगा। लेकिन निवर्तमान कम्युनिस्ट पार्टी के निर्वतमान विधायक डॉ सत्येंद्र कुमार यादव भी महागठबंधन प्रत्याशी को हराने में कोई कर कसर नहीं छोड़ सकते हैं।
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चुनावी समीकरण को ध्वस्त करते हुए जीत दर्ज कराई
लेकिन यह चुनाव इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि यहां निवर्तमान विधायक डॉ. सत्येंद्र कुमार यादव भी अपनी दावेदारी बनाए हुए हैं। कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा माले) से ताल्लुक रखने वाले निवर्तमान विधायक को टिकट अगर नहीं मिला तो महागठबंधन के अधिकृत प्रत्याशी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने यहां से जीत दर्ज की थी। हालांकि सबसे दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने सिवान जिले के रघुनाथपुर विधानसभा सीट से विधायक सह पूर्व मंत्री रहे विजय शंकर दूबे को टिकट देकर मैदान में उतारा था। राजग गठबंधन के प्रत्याशी को शिकस्त देकर विधानसभा पहुंचे थे। लेकिन 2020 के चुनाव में उनको सिवान के महाराजगंज से कांग्रेस पार्टी ने टिकट देकर चुनावी समीकरण को ध्वस्त करते हुए जीत दर्ज कराने में सफलता पाई थी।
अब तमाम समीकरणों और जातीय संतुलन को देखते हुए राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सामने एक कठिन निर्णय है। उन्हें यह तय करना होगा कि चुनावी रणनीति को ब्राह्मण कार्ड के सहारे आगे बढ़ाया जाए या फिर MY समीकरण के बल पर जीत की कोशिश की जाए। कुल मिलाकर मांझी सीट पर उम्मीदवार चयन से ही चुनावी परिणाम की दिशा तय हो सकती है। गलत फैसला राजद को भारी पड़ सकता है, जबकि रणनीतिक संतुलन उसे सीट दिला सकता