सीतामढ़ी जिले के सुरसंड प्रखंड अंतर्गत रघरपुरा गांव के बलिदानी सुंदर खतवे का परिवार आजादी के दशकों बाद भी घोर उपेक्षा और गरीबी का दंश झेलने को मजबूर है। वर्ष 1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीद के परिजनों के पास आज न तो रहने के लिए पक्का मकान है और न ही आजीविका का कोई ठोस साधन।
जमीनी स्तर पर जब शहीद के घर की स्थिति देखी गई, तो वहां का खौफनाक और दर्दनाक मंजर सामने आया। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के तमाम दावों के बावजूद यह पीड़ित परिवार मिट्टी और फूस की कच्ची झोपड़ी में जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहा है।
बरगद के पेड़ पर दी थी फांसी
इतिहासकारों और शोधकर्ता शिक्षाविद विनोद बिहारी मंडल के अनुसार, 1942 के आंदोलन के समय सुरसंड क्षेत्र क्रांतिकारियों का प्रमुख गढ़ माना जाता था। 27 अगस्त 1942 को सुरसंड इलाके के तमाम आंदोलनकारियों ने सरकारी दफ्तरों पर तिरंगा फहराया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया। रघरपुरा निवासी सुंदर खतवे लाठी चलाने में माहिर और इलाके के नामी पहलवान थे। आंदोलन में अंग्रेजी सिपाहियों को कड़ी चुनौती देने वाले सुंदर खतवे को ब्रिटिश पुलिस ने पकड़ लिया और इलाके में दहशत फैलाने के उद्देश्य से बनौली चौक स्थित बरगद के पेड़ पर फांसी पर लटकाकर उनकी हत्या कर दी।
दमघोंटू झोपड़ी और मासूमों की बेबसी
अमर बलिदानी के घर पहुंचने पर देखा गया कि शहीद के परिवार के छोटे-छोटे नन्हे-मुन्ने बच्चे मिट्टी की जमीन पर गमछा बिछाकर सोए हुए थे। बच्चों को सुलाने तक की जगह घर में मयस्सर नहीं है। घर में 6/6 के दो छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं, जिनमें बेड और सारा गृहस्थी का सामान ठूंसा हुआ है। इसके अलावा एक 8/10 का कमरा है, जिसमें खाना बनता है और वहीं खाना बनाने वाली सूखी लकड़ियां रखी हुई हैं, जिससे हर वक्त जहरीले सांप-बिच्छू निकलने का डर बना रहता है।
मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही शहीद की पीढ़ी
सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के विपरीत इस परिवार तक कोई वास्तविक लाभ नहीं पहुंचा है। घर में कहने को एक शौचालय बना है, लेकिन उसमें दरवाजा तक नहीं है और वह सिर्फ पर्दा लगाकर इस्तेमाल हो रहा है। पानी के लिए परिवार के लोगों को दूसरों के चापाकल पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां अक्सर उन्हें बातें सुननी पड़ती हैं। शहीद के पोते की बहू नगीना देवी बताती हैं कि कोई भी प्रशासनिक अधिकारी या नेता उनकी सुध लेने नहीं आता, केवल झूठे आश्वासन दिए जाते हैं। हमारे दादा जी देश के इज्जत की लड़ाई लड़े लेकिन, हमारी इज्जत रोड पर है, खुले में स्नान करते हैं।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी का दंश
ग्रामीणों का कहना है कि पूरे गांव में सबसे गरीब स्थिति इसी शहीद परिवार की है। शहीद का पोता मल्लू मंडल खेतों में बटाई लेकर काम करता है और अपने परिवार का पेट पालता है। वहीं, गरीबी और मजबूरी के कारण पढ़ाई न लिखाई हो पाने की वजह से मल्लू मंडल के तीनों बेटे बाहर में मजदूरी करते हैं। बेटे अब अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए बाहर खून-पसीना बहा रहे हैं। मल्लू मंडल का पोता पुलिस बनकर देश की सेवा करना चाहता है, लेकिन गरीबी के कारण परिवार उसे फिलहाल सरकारी स्कूल में ही पढ़ाने को मजबूर है।
कर्ज का बोझ और अधिकारियों की अनदेखी
परिवार की माली हालत इतनी खराब है कि बेटी की शादी के लिए समाज से भारी ब्याज पर 3 लाख रुपये का कर्ज लेना पड़ा था, जिसे चुकाने में पूरा परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। शहीद के पोते मल्लू मंडल का कहना है कि वे अपनी समस्याओं को लेकर सीतामढ़ी में बीडीओ और जिलाधिकारी (DM) तक आवेदन लेकर जा चुके हैं। प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने हर बार आश्वासन तो दिया, लेकिन धरातल पर आज तक कोई इंदिरा आवास या ठोस सरकारी सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई।
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अमरता की गुहार
शहीद के पोते मल्लू मंडल का कहना है कि उन्हें सरकार से कोई अपार धन-दौलत नहीं चाहिए, बल्कि वे केवल इतना चाहते हैं कि सरकार उन्हें इज्जत से जीने लायक एक पक्का आवास दे दे। साथ ही, गांव में उनके दादा अमर बलिदानी सुंदर खतवे के नाम पर एक निशानी या स्मारक बनाया जाए, ताकि उनका नाम हमेशा अमर रहे। वर्तमान में परिवार खुद ही हर साल धूप-अगरबत्ती और फूल अर्पित कर घर पर शहीद की पुण्यतिथि मनाता है, लेकिन व्यवस्था की इस बेरुखी से उनका दिल दहल जाता है।
(इनपुट-
भरत चौबे, सीतामढ़ी)