सत्ता और विपक्ष का समीकरण यह है अभी।
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सवाल- 2022 में राजद कैसे कामयाब हुआ?
जवाब- 2017 से नीतीश कुमार फिर एनडीए के साथ थे, लेकिन 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव ने उन्हें बुरी तरह परेशान किया। राज्य के राजनीतिक दलों, खासकर भाजपा के साथ बड़े भाई की भूमिका में रहे जनता दल यूनाईटेड को एनडीए के अंदर पहली बार कमजोरी का एहसास हुआ। तब चिराग पासवान ने बहुत बड़ा खेल कर दिया था। इस खेल में भाजपा का हाथ बताया जाता रहा है, हालांकि आज तक यह साबित नहीं हो सका है। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में चिराग पासवान ने जनता दल यूनाईटेड के प्रत्याशियों का वोट काटने के लिए हर जगह प्रत्याशी दे दिए। वोटर संशय में रहे और जदयू तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई।
भाजपा ने चुनाव पूर्व एलान के आधार पर मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश कुमार के पास ही छोड़ी, लेकिन उनकी बातों को दरकिनार भी किया। समन्वय बैठाने वाले सुशील कुमार मोदी को उनके साथ डिप्टी सीएम नहीं बनाना बहुत बड़ा गलत फैसला साबित हुआ। सुशील मोदी राज्यसभा भेज दिए गए और राजद को फिर संभावनाएं दिखने लगीं। 2020 में नीतीश को लगे घाव को साफ करने के लिए सुशील मोदी साथ नहीं थे, जिसका नतीजा एकतरफा यह बात घर करने लगी कि भाजपा वर्चस्व बढ़ाने के लिए जदयू को खत्म कर रही है। राजद ने समय पर ऑफर दे दिया और नीतीश कुमार के एक पुराने साथी ने भाजपा से अपना बदला चुकता कर लिया। इस तरह जनादेश से उलट 2022 में महागठबंधन सरकार बन गई।
सवाल- 2024 में राजद फिर आउट कैसे हुआ?
जवाब- 2022 में जब महागठबंधन की सरकार बनी तो राजभवन के बाहर यह चर्चा शोर के रूप में सुनाई दी कि नीतीश कुमार कुछ ही दिन मुख्यमंत्री रहेंगे, वह कभी भी तेजस्वी यादव को उप मुख्यमंत्री से प्रोन्नत कर मुख्यमंत्री बना देंगे। यह शोर आगे भी मौका-बेमौका सुनाई दे रहा था। फिर जब नीतीश कुमार ने केंद्र की राजनीति में उतरने की योजना बनाई तो एक तरफ इस शोर को राजद ने आगे बढ़ाया और दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव ने उनका साथ नहीं दिया। नीतीश कुमार ने तब देशभर से भाजपा-विरोधी दलों को बिहार में जुटाया। यही जुटान आगे चलकर I.N.D.I.A. के रूप में सामने आया। पहली बैठक से नीतीश कुमार को इसका 'संयोजक' बनाने की बात थी, लेकिन लालू प्रसाद यादव तो कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी को 'दूल्हा' घोषित करने में जुट गए। इस गठबंधन का दूल्हा मतलब एक तरह से प्रधानमंत्री पद के लिए चेहरा। बात यहीं से बिगड़ने लगी।
2023 में इस गठबंधन- I.N.D.I.A. की बैठकों में लगातार नीतीश कुमार का कद कमजोर करने का सिलसिला चला। जदयू के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को छोड़ ज्यादातर ऐसी स्थिति में राजद के साथ बने रहने को उचित नहीं मान रहे थे। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार ने पहले पार्टी की कमान अपने पास ली और फिर जनवरी 2024 में भाजपा के साथ जाने का संकेत देते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस बार तत्कालीन विधायक संजय कुमार झा ने भाजपा विधायकों का समर्थन पत्र लाकर दिया और फिर से मुख्यमंत्री बन गए नीतीश कुमार। राजद सरकार से निकला तो उसने 12 फरवरी 2024 को नीतीश कुमार सरकार के बहुमत प्रस्ताव में खेला की तैयारी की। तैयारी की कमान खुद लालू प्रसाद संभाल रहे थे, हालांकि भाजपा-जदयू ने उलटा खेल कर दिया और महागठबंधन के ही कई विधायक सरकार के पक्ष में आ गए।
सवाल- 2025 से राजद क्या बदल रहा स्टैंड?
जवाब- हां। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले राजद लगातार नीतीश कुमार को लेकर नजरिया बदल रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले से राजद एक तरफ नीतीश को बीमार-बुजुर्ग बताता रहा और दूसरी तरफ यह भी कहता रहा कि भाजपा उन्हें धोखा देगी। भाजपा ने धोखा दिया या नहीं, यह खुद नीतीश कुमार ही अब बता सकते हैं। वैसे, वह स्वेच्छा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने और राज्यसभा जाने की बात कहते रहे हैं। दूसरी तरफ राजद अप्रैल 2026 में भाजपाई मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कुर्सी पर बैठने के समय से ही नीतीश कुमार के दिमाग से खेलने की कोशिश कर रहा है। वह सम्राट चौधरी के आपराधिक इतिहास की बात उछाल रहा है, ताकि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार अपना मन बदलें। अब राजद ने समान नागरिक संहिता, यानी यूसीसी को लेकर नीतीश की पुरानी असहमति को दरकिनार कर बिहार में इसे लागू कराने के भाजपा के एलान को मुद्दा बनाते हुए ऑफर भी कर दिया है।
राजद सरकार में आना चाह रहा, लेकिन जदयू ही इकलौता सहारा।
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सवाल- तो क्या राजद का ऑफर काम करेगा?
जवाब- इस सवाल का जवाब परिस्थितियों में छिपा है। राजद का आरोप था कि भाजपा अपना वर्चस्व बढ़ाते हुए जदयू का सफाया कर रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव 2025 का गणित कहता है कि कभी अपने बूते विधानसभा का जादुई आंकड़ा छूने वाली लालू प्रसाद यादव की पार्टी 25 सीटों पर सिमट गई है तो जदयू ने पिछले चुनाव के मुकाबले अपनी सीटें लगभग दोगुनी कर ली है। 2020 के चुनाव में जदयू को 43 सीटों पर जीत मिली थी और 2025 में उसके 85 विधायक चुने गए। राजद का आरोप है कि भाजपा नीतीश की अनिच्छा से यूसीसी थोप रही है, लेकिन जनता दल यूनाईटेड इस प्रस्ताव के आने और उसपर विचार की बात कह रहा है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने कोई भी बयान नहीं दिया है और पार्टी कह रही है कि राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा इसपर बिहार के राजनीतिक-सामाजिक तानाबाना के हिसाब से गृह मंत्री अमित शाह से बात करेंगे। तीसरी और महत्वपूर्ण परिस्थिति यह भी है कि जदयू में भाजपा-विरोधी चेहरे अभी या तो गौण हैं या किनारे। निर्णय लेने की स्थिति में जो हैं, वह भाजप-विरोधी नहीं हैं। एक और बात यह भी भले ही सम्राट चौधरी कह रहे हैं कि उन्हें भाजपा ने चुना है, लेकिन जदयू में एक-एक को पता है कि नीतीश कुमार के प्रस्ताव पर ही भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें बैठाया है।
सवाल- राजद किस गणित पर कर रहा ऑफर?
जवाब- परिस्थितियां कोई भी रहें, जदयू के पास सत्ता की चाबी हमेशा रह रही। भाजपा के लिए जदयू को साथ रखना जरूरी-मजबूरी दोनों हैं। राजद को सत्ता में आने के लिए पहले जदयू के साथ की मजबूरी होती थी, इस बार तो जरूरी है। बिहार विधानसभा चुनाव में राजद विधायक तेजस्वी यादव के पास
विपक्ष के नेता की कुर्सी भी बहुत मुश्किल से है। 243 विधायकों वाली बिहार विधानसभा में अगर 24+ विधायक न हों तो विपक्ष के नेता की कुर्सी खिसक जाएगी। तेजस्वी खुद मिलाकर 25 विधायक वाले राजद का नेतृत्व कर रहे हैं। जिस महागठबंधन ने एकीकृत होकर एनडीए के खिलाफ चुनाव लड़ा था, उसकी ताकत ही 35 विधायकों में सिमट गई थी।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की सक्रियता के बावजूद कांग्रेस बिहार में छह सीटों पर सिमटी हुई है। इसके अलावा, वामदलों के तीन और इंडियन इनक्लुसिव पार्टी के एक विधायक मिलाकर महागठबंधन की वास्तविक ताकत 35 विधायकों की है। परिस्थितिवश, असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के पांच, कुमारी मायावती की बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक को मिला भी दें तो महागठबंधन की ताकत 41 होती है। भाजपा विरोध के नाम पर जन सुराज ने महागठबंधन का साथ देने की ठानी तो भी इकलौते प्रशांत किशोर को जोड़कर विधायकों की संख्या 42 होगी। ऐसे में जादुई आंकड़े 122 तक पहुंचने के लिए राजद को जदयू के 85 विधायक सीधे-सीधे चाहिए।
जदयू का साथ नहीं मिले और केंद्र की चिंता किए बगैर (जिसकी संभावना शून्य है) चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा के विधायकों को जोड़ दें तो 19+05+04= 28 के मिलने से भी 42+28=70 ही होंगे। चिराग-मांझी केंद्र में मंत्री हैं। यूसीसी पर चिराग समीक्षा की बात कह रहे हैं। मांझी की पार्टी भाजपा के साथ की बात कह चुकी है। उपेंद्र कुशवाहा ने भी चिराग की राह पर समीक्षा की बात कही है। मतलब, यह समीकरण भी नहीं चलेगा। यानी, राजद को सिर्फ जदयू ही सत्ता में ला सकता है।
सवाल- न परिस्थिति, न गणित तो फिर धुआं क्यों?
जवाब- चाणक्य इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- "राजद की वापसी की संभावना अभी नहीं दिख रही है, फिर भी ऑफर आ रहा है। सम्राट चौधरी को सफाई देनी पड़ रही है। तो, इसका एक उद्देश्य यह हो सकता है कि नीतीश कुमार को असहज रखा जाए कि वह कुछ बड़ा निर्णय लें और राजद की पुनर्वापसी कर रास्ता बने। ऐसा इसलिए भी क्योंकि 2030 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले और कोई मौका है नहीं। इसी अंतराल के कारण राजद के 25 और कांग्रेस के छह विधायकों में से कई के टूटकर एनडीए में जाने की चर्चाएं उठती रहती हैं। कांग्रेस किसी तरह बचाने में अब तक कामयाब रही है, जबकि राजद को भी हर समय नजर बनाए रखनी पड़ रही है। सरल शब्दों में इसलिए माहौल बनाए रखा जा रहा है।"