बिहार थाना क्षेत्र स्थित नवजीवन शिशु अस्पताल से तीन साल पहले संदिग्ध परिस्थितियों में नवजात बच्चे के गायब होने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए बिहार थाना के थानाध्यक्ष सम्राट दीपक को तत्काल प्रभाव से विशेष जांच दल (एसआईटी) से हटाने और उनका तबादला जिले से बाहर करने का आदेश दिया है। सुनवाई के दौरान नालंदा के पुलिस अधीक्षक हृदय कांत और एसी टू महाधिवक्ता शाश्वत अग्रवाल कोर्ट में मौजूद थे।
अदालत में छलका पीड़ित पिता का दर्द, थानाध्यक्ष पर दस साल तक फंसाने की धमकी का आरोप
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नवजात बच्चे के पिता अविनाश कुमार और उनके भाई से सीधे बातचीत की। इस दौरान पुलिस की कार्यशैली को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए। याचिकाकर्ता अविनाश कुमार ने बिहार थाना के थानाध्यक्ष सम्राट दीपक की मौजूदगी में आरोप लगाया कि उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया गया और केस वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया। पीड़ित पिता ने अदालत को बताया कि बच्चे की पहचान सुनिश्चित करने के लिए जब डीएनए टेस्ट की प्रक्रिया चल रही थी, उस दौरान पुलिस अधिकारी ने उन्हें कथित तौर पर धमकी दी कि अगर वे पीछे नहीं हटे तो अगले दस वर्षों तक इसी मुकदमे में फंसाकर बर्बाद कर दिया जाएगा।
अविनाश कुमार ने यह भी बताया कि बच्चे के गायब होने के तुरंत बाद जब वह शिकायत लेकर बिहार थाना पहुंचे थे, तब तत्कालीन थानाध्यक्ष नीरज कुमार ने करीब दो महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं की। उन्हें लगातार थाने के चक्कर लगाने पड़े। इसके बाद मामले के पहले अनुसंधानकर्ता नील कमल पर भी लापरवाही का आरोप लगाया गया। पीड़ित के अनुसार, उनकी लापरवाही के कारण अस्पताल और अन्य स्थानों से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजी और तकनीकी साक्ष्यों से छेड़छाड़ होने दी गई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अनदेखी पर नाराज कोर्ट, डीएम और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी नवजात या मासूम बच्चे के गायब होने की सूचना मिलने के बाद दो महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं करना सुप्रीम कोर्ट के स्थापित निर्देशों के विपरीत है। अदालत ने बचपन बचाओ आंदोलन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्चे के गायब होने की सूचना मिलते ही पुलिस को बिना किसी प्रारंभिक देरी के अपहरण या मानव तस्करी से जुड़ी धाराओं में केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए।
अदालत ने इस मामले को पुलिस तंत्र और नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी के स्तर पर भी असंवेदनशील रवैये का उदाहरण बताया। कोर्ट ने कहा कि जब पुलिस अधिकारी दो महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं करता और इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट भी प्रारंभिक जांच के नाम पर कई सप्ताह लगा देते हैं, फिर घटना को सही पाते हुए केस दर्ज करने का निर्देश देते हैं, तो ऐसी व्यवस्था से मानव तस्करी जैसी गंभीर समस्या से प्रभावी ढंग से निपटना मुश्किल है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मानव तस्करी और नवजात बच्चों की खरीद-बिक्री के मामलों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित गिरोह सक्रिय हो सकते हैं। ऐसे मामलों में शुरुआती महत्वपूर्ण समय यानी ‘गोल्डन आवर’ में पुलिस की तत्परता बेहद जरूरी है। शुरुआती समय निकल जाने पर लापता बच्चे का पता लगाना बेहद मुश्किल हो सकता है।
डीजीपी के बयान का हवाला, संवेदनशील अधिकारियों की तैनाती की वकालत
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने बाल न्याय व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर भी चर्चा की। अदालत ने हाल ही में किशोर न्याय पर आयोजित राज्य स्तरीय एक दिवसीय सम्मेलन का उल्लेख किया। कोर्ट के मुताबिक, बिहार के पुलिस महानिदेशक ने इस सम्मेलन में सार्वजनिक रूप से बताया था कि राज्य में एक साल के भीतर 14,500 से अधिक बच्चों के गायब होने के मामले सामने आए हैं।
जजों ने कहा कि अगर राज्य में बच्चों के लापता होने की स्थिति इतनी गंभीर है तो थानों की कमान संवेदनशील और सजग पुलिस अधिकारियों को दी जानी चाहिए। अदालत ने सुझाव दिया कि थानों में पुलिस अधिकारियों की तैनाती से पहले उनकी सोच और मानसिक प्रवृत्ति को समझने के लिए ‘एटीट्यूडनल टेस्ट’ यानी दृष्टिकोण परीक्षण कराया जाना चाहिए। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि संबंधित अधिकारी संवेदनशील मामलों में कितनी तेजी और मानवीय तरीके से कार्रवाई कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने नालंदा एसपी को यह भी पता लगाने का निर्देश दिया कि मामले के पहले दिन से अब तक किन-किन अधिकारियों ने लापरवाही बरती। अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पीड़ित पिता अपने बच्चे की तलाश में क्यों भटक रहा है।
सीलबंद लिफाफे में पेश हुई जांच रिपोर्ट, एफएसएल रिपोर्ट के बाद अस्पताल का लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई
पिछली सुनवाई के आदेश के तहत नालंदा एसपी हृदय कांत व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश हुए। उन्होंने केस डायरी और जांच की अद्यतन प्रगति रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में खंडपीठ के सामने पेश की। दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की मौजूदगी में अदालत ने लिफाफा खुलवाकर रिपोर्ट देखी। मामले की जांच अभी संवेदनशील स्थिति में होने के कारण कोर्ट ने जांच से जुड़े गोपनीय तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया। रिपोर्ट को दोबारा सीलबंद कर हाईकोर्ट के महानिबंधक के संरक्षण में रखने का आदेश दिया गया।
सुनवाई में बताया गया कि पटना स्थित विधि विज्ञान प्रयोगशाला यानी एफएसएल से महत्वपूर्ण जांच रिपोर्ट मिल चुकी है। इस रिपोर्ट और सामने आई अनियमितताओं के आधार पर आरोपी चिकित्सक के नवजीवन शिशु अस्पताल का निबंधन रद्द करने की दिशा में कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
एसपी ने अदालत को बताया कि घटना के समय 23 मार्च 2023 से 11 अप्रैल 2023 के बीच अस्पताल में कुल 36 नवजात बच्चों को भर्ती कराया गया था। पुलिस की जांच टीम अब तक इनमें से 34 बच्चों के परिजनों का भौतिक सत्यापन कर चुकी है। बाकी परिवारों के सत्यापन की प्रक्रिया भी चल रही है। पुलिस का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं बच्चों से जुड़े किसी अवैध लेनदेन या अदला-बदली का मामला तो नहीं हुआ।
वकील का दावा- पॉलीग्राफ टेस्ट में बयान भ्रामक, रिकॉर्ड में ‘मेल’ को ‘फीमेल’ करने की हेराफेरी
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव कुमार सक्सेना ने अदालत में पुलिस जांच और फोरेंसिक जांच से जुड़े कई बिंदुओं की जानकारी दी। अधिवक्ता के अनुसार, आरोपी चिकित्सक और अस्पताल के कर्मचारियों का वैज्ञानिक तरीके से पॉलीग्राफ टेस्ट कराया गया था। उनके मुताबिक, टेस्ट की रिपोर्ट में दिए गए बयान भ्रामक और संदेहास्पद पाए गए। अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि इससे संकेत मिलता है कि अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर पुलिस से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने की कोशिश कर रहे थे।
उन्होंने यह भी बताया कि घटना के समय अस्पताल से जब्त रजिस्टर और अन्य दस्तावेज एफएसएल जांच के लिए भेजे गए थे। अधिवक्ता के अनुसार, फोरेंसिक जांच में दस्तावेजों में छेड़छाड़ की पुष्टि हुई है। अधिवक्ता ने दावा किया कि नवजात के लिंग से संबंधित रिकॉर्ड में जानबूझकर बदलाव किया गया। जहां रिकॉर्ड में अंग्रेजी में ‘मेल’ लिखा था, उसके आगे ‘एफई’ जोड़कर उसे ‘फीमेल’ बनाने की कोशिश की गई। अधिवक्ता के मुताबिक, एफएसएल रिपोर्ट में इस तरह की हेराफेरी सामने आई है। उनका आरोप है कि नवजात को गायब करने के लिए दस्तावेजों में सुनियोजित तरीके से बदलाव किया गया।
डॉक्टर की पत्नी के मैटरनिटी सेंटर की भी जांच, अंतरराज्यीय गिरोह की आशंका
नालंदा एसपी ने अदालत को बताया कि उन्होंने पिछले महीने ही जिले की कमान संभाली है। इससे पहले एसपी भरत सोनी थे, जिनका तबादला सीवान जिले में हो चुका है। नए एसपी ने जांच का दायरा बढ़ाते हुए बताया कि संबंधित समय में दूसरे निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों में भर्ती हुए नवजात बच्चों का भी रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है। मुख्य आरोपी डॉ. ब्रजेश कुमार की पत्नी द्वारा संचालित मैटरनिटी सेंटर में भर्ती बच्चों का भी विस्तृत सत्यापन कराया जा रहा है।
पुलिस को आशंका है कि अस्पताल पर कार्रवाई या विवाद की जानकारी मिलने के बाद वहां के कई महत्वपूर्ण उपकरण और सामान हटाकर डॉक्टर की पत्नी के क्लिनिक में स्थानांतरित किए गए थे। एसपी ने अदालत में यह भी कहा कि नवजात बच्चों की चोरी और उनकी खरीद-बिक्री में किसी अंतर-जिला या अंतरराज्यीय संगठित गिरोह की भूमिका की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी वजह से पुलिस ऐसे संदिग्ध दलालों और बिचौलियों की गतिविधियों पर नजर रख रही है, जिनके नवजात बच्चों के अवैध व्यापार से जुड़े होने की आशंका है।
अग्रिम जमानत पर बाहर डॉक्टर के जांच में सहयोग न करने का आरोप, कोर्ट ने दिए सख्त निर्देश
आरोपी चिकित्सक डॉ. ब्रजेश कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर सिंह अदालत में पेश हुए। उन्होंने कहा कि जांच के बाद अस्पताल को सील कर दिया गया है, लेकिन डॉक्टर को अब तक जांच रिपोर्ट की प्रति नहीं मिली है। इस पर अदालत ने प्रतिवादी को जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। वहीं नालंदा एसपी ने अदालत को बताया कि आरोपी डॉक्टर को हाईकोर्ट से दांडिक विविध वाद संख्या 32179/2026 में अग्रिम जमानत मिल चुकी है, लेकिन वह वर्तमान पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं और लगातार टालमटोल कर रहे हैं।
डॉक्टर के वकील ने इस आरोप से इनकार किया। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर चिकित्सक जांच में सहयोग नहीं करते हैं या जांच एजेंसी को लगता है कि वह किसी महत्वपूर्ण तथ्य या साक्ष्य को जानबूझकर छिपाने की कोशिश कर रहे हैं, तो अनुसंधान एजेंसी कानून के तहत जमानत रद्द कराने समेत अन्य सख्त कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
केस वापस लेने का दबाव बनाने का आरोप, दो लोगों पर कार्रवाई और पीड़ित परिवार को सुरक्षा का आदेश
सुनवाई के दौरान पीड़ित पिता अविनाश कुमार ने आरोप लगाया कि मुकदमा वापस लेने और अदालत से केस उठाने के लिए स्थानीय दबंगों की ओर से उन पर दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने अदालत को बताया कि हाल के दिनों में आपराधिक छवि वाले कुछ लोग उनके घर आ रहे हैं और समझौता करने के लिए धमका रहे हैं। पीड़ित ने दो लोगों के नाम भी अदालत को बताए। इनमें छबीलापुर थाना क्षेत्र का निवासी जुगेश गोप उर्फ मास्टर और सिलाव थाना क्षेत्र का निवासी सुतील यादव शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए नालंदा एसपी को दोनों व्यक्तियों के संबंध में तत्काल आरोपों का सत्यापन करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर जांच में यह साबित होता है कि दोनों कभी पीड़ित के घर गए थे या केस वापस लेने के लिए उन्हें डराया-धमकाया था, तो उनके खिलाफ तत्काल नई एफआईआर दर्ज की जाए और गिरफ्तारी सहित सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। अदालत ने नालंदा पुलिस को पीड़ित परिवार को चौबीसों घंटे पर्याप्त और पुख्ता सुरक्षा देने का भी आदेश दिया, ताकि कोई असामाजिक तत्व उनके घर पहुंचकर उन्हें धमका न सके।
मार्च-अप्रैल 2023 की घटना, बच्चे की तलाश में तीन साल से न्याय की लड़ाई
मामला मार्च-अप्रैल 2023 का है। पीड़ित अविनाश कुमार के नवजात बच्चे को इलाज के लिए बिहार शरीफ स्थित नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि भर्ती के कुछ दिनों बाद अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर की मिलीभगत से उनका स्वस्थ नवजात बच्चा गायब कर दिया गया। परिजनों ने जब बच्चे के बारे में जानकारी मांगी तो अस्पताल प्रशासन की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला। आरोप है कि उन्हें लगातार टालमटोल किया गया। बाद में रिकॉर्ड में हेराफेरी कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि परिजनों को कोई दूसरा बच्चा या बच्ची दी गई थी अथवा बच्चा मृत था।
बच्चे के गायब होने के बाद पिता बिहार थाना पहुंचे और पुलिस से मदद मांगी। उनका आरोप है कि तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने शिकायत पर तुरंत कार्रवाई नहीं की। करीब दो महीने तक थाने के चक्कर लगाने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसके बाद पीड़ित ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और प्रशासन के स्तर पर शिकायत की। प्रशासनिक जांच में भी देरी हुई और मामला आगे बढ़ता रहा। आखिरकार पीड़ित पिता ने अपने बच्चे की बरामदगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पटना हाईकोर्ट में आपराधिक रिट याचिका दायर की। कई वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद अब हाईकोर्ट ने मामले की सीधे निगरानी शुरू की है। इसके बाद पुलिस जांच में तेजी आई है और अस्पताल, दस्तावेजों, भर्ती हुए बच्चों तथा संबंधित लोगों की भूमिका की जांच आगे बढ़ाई जा रही है।
6 अक्टूबर को अगली सुनवाई, ऑनलाइन पेश होंगे नालंदा एसपी
पटना हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 6 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की है। अदालत ने नालंदा एसपी हृदय कांत को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अगली तारीख से पहले थानाध्यक्ष को एसआईटी से हटाने और उनका तबादला करने, पीड़ित परिवार की सुरक्षा, धमकी देने के आरोपों पर एफआईआर, पुराने लापरवाह अधिकारियों की पहचान और अब तक हुई पूरी जांच की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट अदालत के रिकॉर्ड पर पेश की जाए।
हाईकोर्ट के इस सख्त आदेश के बाद अब मामले की जांच में पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर हुई लापरवाही की भी पड़ताल होगी। साथ ही नवजात के गायब होने से जुड़े सभी पहलुओं, दस्तावेजों में कथित हेराफेरी और संभावित अवैध नेटवर्क की जांच भी आगे बढ़ेगी।