नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव(फाइल फोटो)
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने गुरुवार को प्रेस कांफ्रेंस सियासत को एक बार फिर से गरमा दिया है। राजद ने सत्तारुढ़ जदयू को अपने साथ आने की पेशकश कर डाली। यह पेशकश लालू यादव के खास और राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने की। दरअसल, प्रेस कांफ्रेंस कर सिंह ने कहा कि भाजपा के आगे नीतीश कुमार किसी भी हालत में न झुकें। विशेष राज्य का दर्जा और जातीय जनगणना के मुद्दे पर नीतीश सरकार पर किसी तरह का राजनीतिक असर पड़ता है तो महागठबंधन नीतीश कुमार को साथ देने के लिए खड़ा है। अब सवाल यह उठता है कि अगर केंद्र सरकार जातीय जनगणना पर नीतीश कुमार की बात नहीं मानती है तो बिहार में सियासत एक बार फिर से बदल सकती है। वैसे नीतीश कुमार के मूड से लग नहीं रहा कि वे भाजपा के सामने इतनी जल्दी हाथ खड़ा कर देंगे। अगर इस मुद्दे पर बात नहीं बनती है तो नीतीश अपने पुराने रंग में फिर से आ सकते हैं। यानी कि सत्ता के लिए किसी से भी हाथ मिला सकते हैं। चाहे वह आरजेडी ही क्यों न हो। हालांकि उनके पास आरजेडी ही विकल्प है।
हमेशा दोनों दरवाजा खोलकर रखते हैं नीतीश
आरजेडी के ऑफर के बाद से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सहयोगी पार्टी भाजपा को चिंता सताने लगी है और पुराने दिन याद आने लगे हैं जब 2017 में नीतीश कुमार ने रातोंरात पाला बदल लिया था। अपने लिए हमेशा दोनों दरवाजा खोले रखने वाले नीतीश कुमार का कुछ कहा नहीं जा सकता है क्योंकि वे सत्ता के लिए कब पलट जाएं कहना मुश्किल है। अगर जातिय जनगणना के मुद्दे पर भाजपा से बात बन जाती है तो कोई बात नहीं, यदि नहीं बनती है तो फिर आरजेडी और कांग्रेस के साथ जाने में भी कोई गुरेज नहीं करेंगे। नीतीश कुमार ही हैं जिन्होंने कहा था कि मिट्टी में मिल जाएंगे, पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे। लेकिन क्या हुआ फिर वे भाजपा के साथ आए और पीएम मोदी के साथ मंच भी साझा किया।
कम सीट के बावजूद सीएम बनते हैं तो नीतीश ही
साल 2015 की बात करें तो उस समय नीतीश महागठबंधन में चले गए थे और चुनाव लड़े थे। चुनाव में आरजेडी से कम सीटें आने के बावजूद वह मुख्यमंत्री बन गए। फिर 2020 के चुनाव की बात करें तो इस चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू की 28 सीटें घट गईं और वह 43 पर आ गई, जबकि भाजपा की 21 सीटें बढीं और वह 74 पर पहुंच गई। इसके बावजूद भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया।