नालंदा विश्वविद्यालय में 9 और 10 जनवरी को हिंदी भाषा के संवर्धन और वैश्विक संवाद में विभिन्न संस्थाओं की भूमिका पर एक महत्वपूर्ण द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। यह संगोष्ठी ऐसे समय में हो रही है जब हिंदी की वैश्विक पहचान और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनने की संभावनाओं पर देश में चर्चा तेज हो गई है।
देश और विदेश से 100 से अधिक विद्वान इस संगोष्ठी में भाग ले रहे हैं। इनमें वरिष्ठ अध्येता, विश्वविद्यालयों के कुलपति और प्राध्यापक, हिंदी सेवी संस्थाओं के पदाधिकारी, मीडिया के संपादक, लेखक और शोधार्थी शामिल हैं। संगोष्ठी का उद्देश्य हिंदी की समकालीन भूमिका, वैश्विक स्वीकार्यता और भारतीय ज्ञान परंपरा में उसकी अहमियत पर बहुआयामी चर्चा करना है।
उद्घाटन शुक्रवार को
संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र शुक्रवार को सुबह 11 बजे सुषमा स्वराज सभागृह में होगा। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी विषय प्रवर्तन करेंगे। इस अवसर पर बिहार संग्रहालय के महानिदेशक और पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, अज़रबैजान में भारत के राजदूत अभय कुमार और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक एवं पूर्व राज्यसभा सांसद तरुण विजय जैसे विशिष्ट अतिथि शामिल होंगे। दो दिनों में कुल सात अकादमिक सत्र और एक समापन सत्र होंगे। इन सत्रों में हिंदी पत्रकारिता से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक के विषयों पर चर्चा होगी।
संगोष्ठी का पहला सत्र भाषायी नवाचार और संपादन पर केंद्रित है। इसमें हिंदी पत्रकारिता और भाषा के समकालीन स्वरूप पर विमर्श होगा। इस सत्र की अध्यक्षता पूर्व राज्यसभा सांसद और पाञ्चजन्य के संपादक तरुण विजय करेंगे। बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत सहित अन्य वरिष्ठ पत्रकार अपने विचार साझा करेंगे।
दूसरे सत्र में नालंदा की ऐतिहासिक, बौद्धिक और साहित्यिक परंपरा पर चर्चा होगी। इस सत्र की अध्यक्षता नालंदा संग्रहालय के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह करेंगे। लिस्बन विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विद्वान इसमें भाग लेंगे। तीसरा सत्र भाषायी नवाचार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी अनुप्रयोग पर केंद्रित होगा। डिजिटल इंडिया की भाषिणी परियोजना के CEO अमिताभ नाग इस सत्र की अध्यक्षता करेंगे। हैदराबाद विश्वविद्यालय की प्रो. अंबा कुलकर्णी और IIT कानपुर के प्रो. अनंत भट्टाचार्य हिंदी के डिजिटल भविष्य पर अपने विचार साझा करेंगे।
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संगोष्ठी का महत्वपूर्ण सत्र संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की आधिकारिक भाषा बनने के विषय पर होगा। विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव अंजू रंजन इस सत्र की अध्यक्षता करेंगी। राजदूत अभय कुमार और विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस के पूर्व महासचिव प्रो. विनोद कुमार मिश्र हिंदी की वैश्विक भूमिका पर अपने विचार रखेंगे। संगोष्ठी में उच्च शिक्षण संस्थानों और हिंदी सेवी संस्थाओं की भूमिका पर भी विशेष सत्र होंगे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, IIT कानपुर, केंद्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विद्वान इसमें भाग लेंगे।
यह संगोष्ठी नालंदा की प्राचीन बौद्धिक परंपरा को आज की हिंदी की वैश्विक विमर्श से जोड़ने का प्रयास है। जिस तरह नालंदा कभी विश्व का प्रमुख शिक्षा केंद्र था, उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नालंदा विश्वविद्यालय आज हिंदी को वैश्विक संवाद की भाषा बनाने में योगदान दे रहा है।
समापन शनिवार को
10 जनवरी को समापन सत्र में संगोष्ठी में हुए सभी विमर्श का सार प्रस्तुत किया जाएगा। इसमें हिंदी भाषा के भविष्य, वैश्विक संवाद में उसकी भूमिका और नालंदा परंपरा की प्रासंगिकता पर समेकित दृष्टि विकसित की जाएगी। कुछ सत्रों में ऑनलाइन सहभागिता की भी व्यवस्था है, जिससे यह आयोजन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभावशाली बन रहा है। संगोष्ठी हिंदी के वर्तमान स्वरूप के साथ-साथ 21वीं सदी में इसकी संभावनाओं और चुनौतियों पर भी चर्चा करेगी।
प्रख्यात वक्ताओं का बौद्धिक समागम
संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में देश-विदेश के नीति-निर्धारक और विद्वान भाग लेंगे:
• अंजनी कुमार सिंह: महानिदेशक, बिहार संग्रहालय, मुख्यमंत्री के वरिष्ठ सलाहकार।
• प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी: कुलपति, नालंदा विश्वविद्यालय, जो उद्घाटन सत्र में विषय प्रवर्तन करेंगे।
• तरुण विजय: पूर्व राज्यसभा सांसद और प्रसिद्ध लेखक।
• अभय कुमार: अजरबैजान में भारत के राजदूत और 'नालंदा: हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड' के लेखक।
• प्रोफेसर वांगचुक दोरजी नेगी: कुलपति, केंद्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान।
• प्रोफेसर डी. वेंकट राव: नालंदा विश्वविद्यालय में भाषा, साहित्य/मानविकी विद्यापीठ के विभागाध्यक्ष।
• प्रोफेसर अरुण कुमार भगत: बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं और 28 पुस्तकें लिख चुके हैं।
• प्रोफेसर हेमंत कुकरेती: साहित्य अमृत के संपादक और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर।
• सचिन जोशी: वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व रणजी ट्रॉफी खिलाड़ी।
• प्रोफेसर शिव सिंह: यूनिवर्सिटी ऑफ लिस्बन में भाषा विज्ञान के प्राध्यापक।
• प्रोफेसर हीरा पॉल गंगनगी: दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष।
• प्रोफेसर विनायक पांडेय: महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय उज्जैन में दर्शन एवं प्राच्य संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष।
• प्रोफेसर सत्यपाल शर्मा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के आचार्य।
• अमिताभ नाग: डिजिटल इंडिया के भाषिणी डिविजन के सीईओ।
• प्रोफेसर अंबा कुलकर्णी: हैदराबाद विश्वविद्यालय में वरिष्ठ आचार्य।
• प्रोफेसर साई रामकृष्ण सुसरला: एमआईटी स्कूल ऑफ वैदिक साइंसेज के डीन।
• प्रोफेसर अर्णव भट्टाचार्य: आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर।