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दवा खाने से मौत की कही बात
पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा का कहना है कि पुलिस की टेक्निकल टीम को छात्रा के मोबाइल से हैरान करने वाले सुराग मिले हैं। छात्रा ने 24 दिसंबर को इंटरनेट पर साइनाइड और नींद की गोलियों के बारे में सर्च किया था। एसएसपी का कहना है कि जाँच में यह बात सामने आई कि छात्रा 27 दिसंबर से 5 जनवरी तक जहानाबाद स्थित अपने घर पर थी। पटना लौटते वक्त उसने जहानाबाद के अरवल मोड़ स्थित एक मेडिकल स्टोर से एमिटोन प्लस दवा खरीदी थी, जिसकी पुष्टि यूपीआई ट्रांजैक्शन से हुई है। कमरे से बरामद डायरी में छात्रा के मानसिक संघर्ष और निजी परेशानियों का जिक्र है, जिसे अब सीबीआई मुख्य आधार बना रही है।
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बस खानापूर्ति के लिए थानेदारों को किया गया सस्पेंड
पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा का कहना है कि मामले की संवेदनशीलता के बावजूद सूचना देने में देरी और लापरवाही बरतने पर एसएसपी ने सख्त रुख अपनाते हुए कदमकुआं के अपर थानाध्यक्ष और चित्रगुप्त नगर के थानेदार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। हालांकि परिजन और ग्रामीण इसे महज खानापूर्ति बता रहे हैं। उनका आरोप है कि सोशल मीडिया पर लापरवाही करने के शोर से बचने और महज खानापूर्ति करने के लिए महिला थानाध्यक्ष और एक दारोगा को निलंबित किया गया। उनका मानना है कि यदि पुलिस ने समय रहते तत्परता दिखाई होती, तो साक्ष्यों को और बेहतर तरीके से सुरक्षित रखा जा सकता था।
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डीएनए टेस्ट के दावे भी झूठे
एफएसएल रिपोर्ट में यौन हिंसा के संकेत मिलने के बाद एसआईटी और सीबीआई की टीम ने डीएनए जांच की बात कही और परिजन सहित कई लोगों का डीएनए टेस्ट कराया, लेकिन परिणाम फिसड्डी साबित हुआ। परिजनों ने तो यहां तक कहा कि पुलिस मामले की लीपापोती करने के लिए अब हमलोगों को बस परेशान कर रही है। हालांकि पुलिस इस बात का दावा अब भी कर रही है कि इस मामले में वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर संदिग्धों की डीएनए प्रोफाइलिंग कराई जा रही है ताकि दोषियों को कानून के शिकंजे में लाया जा सके। लेकिन परिजन बताते हैं कि उनकी जानकारी यह है कि अब तक डीएनए टेस्ट के लिए जो सैम्पल लिए गये थे उनकी अब तक जांच हुई ही नहीं है।
मीडिया को चेतावनी, फिर बिना जवाब दिए निकल गए
पटना आईजी जितेंद्र राणा ने मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं। चूंकि मामला नाबालिग से जुड़ा है, इसलिए पोक्सो एक्ट के तहत पीड़िता की पहचान, फोटो या पते को उजागर करना दंडनीय अपराध होगा। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन प्रेस वार्ता के दौरान जब पत्रकारों ने आईजी से पूछा कि आखिर घटनास्थल कहाँ है? तो वे सवाल टाल गए और बिना जवाब दिए ही कॉन्फ्रेंस छोड़कर चले गए।
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परिजनों के इन सवालों का कौन देगा जवाब?
अब परिजनों का आरोप है कि उस वार्डन से पुलिस ने पूछताछ क्यों नहीं की? छात्रावास की संचालक नीलम अग्रवाल और श्रवण अग्रवाल से पुलिस ने पूछताछ क्यों नहीं की? परिजनों का सवाल यह भी हैऊ कि इतना हंगामा हो गया लेकिन इसके बाद भी गिरफ्तार किए गये मनीष कुमार को पुलिस ने रिमांड पर लेकर पूछताछ क्यों नहीं की? जब मृतक के परिजनों का कॉल डिटेल्स की जांच की जा सकती है तो फिर निलंबित थानाध्यक्ष रौशनी कुमारी के कॉल डिटेल्स की जांच क्यों नहीं की गई? साथ ही पुलिस ने छात्रावास में रहने वाली अन्य लड़कियों से पूछताछ हुई या नहीं? अगर हुई तो उसके क्या निष्कर्ष निकले? और अगर पूछताछ नहीं हुई तो निश्चित तौर पर घटना के अनुसंधान में कमी मानी जानी चाहिए। सवाल यह भी है कि एसआईटी टीम में उन्ही पदाधिकारियों को शामिल किया गया, जिनपर इस मामले को प्रभावित करने के आरोप लगे थे। क्या बिहार पुलिस में ऐसे सक्षम अधिकारियों की कमी है जो गंभीर मामलों का निष्पक्ष अनुसंधान कर सके?