उपेन्द्र कुशवाहा और दीपक प्रकाश
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नीतीश कुमार के साथ-साथ भाजपा और जदयू के कई नेताओं ने नई सरकार में शपथ ली, उसमें कुछ चेहरे बिलकुल नए हैं। यानी पहली बार चुनाव लड़कर जीत हासिल की और वेलोग अब विधानसभा में नजर आएंगे। लेकिन कल से आज तक एक नए चेहरे पर चर्चा हो रही है, जिनके बारे में यह कहा जा रहा है कि वह बिना चुनाव लड़े ही मंत्री बन गए। जी वह हैं दीपक प्रकाश। बिना चुनाव लड़े मंत्री बनने वाले दीपक प्रकाश सोशल मीडिया खूब ट्रोल हो रहे हैं। लोग एनडीए पर कटाक्ष करते हुए परिवारवाद पर भी सवाल उठा रहे हैं, ऐसे में उपेन्द्र कुशवाहा सामने आकर जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि दीपक प्रकाश फेल विद्यार्थी नहीं है।
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यह कदम जरुरी ही नहीं अपरिहार्य था
उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि, "मेरा पक्ष है कि अगर आपने हमारे निर्णय को परिवारवाद की श्रेणी में रखा है, तो जरा समझिए मेरी विवशता को। पार्टी के अस्तित्व व भविष्य को बचाने व बनाए रखने के लिए मेरा यह कदम जरुरी ही नहीं अपरिहार्य था। मैं तमाम कारणों का सार्वजनिक विश्लेषण नहीं कर सकता, लेकिन आप सभी जानते हैं कि पूर्व में पार्टी के विलय जैसा भी अलोकप्रिय और एक तरह से लगभग आत्मघाती निर्णय लेना पड़ा था। जिसकी तीखी आलोचना बिहार भर में हुई। उस वक्त भी बड़े संघर्ष के बाद आप सभी के आशीर्वाद से पार्टी ने सांसद, विधायक सब बनाए। लोग जीते और निकल लिए। झोली खाली की खाली रही। शुन्य पर पहूंच गए। पुनः ऐसी स्थिति न आए, सोचना ज़रूरी था।
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सवाल उठाइए, लेकिन जानिए
उपेन्द्र कुशवाहा ने आगे लिखा है कि, "सवाल उठाइए, लेकिन जानिए। आज के हमारे निर्णय की जितनी आलोचना हो, लेकिन इसके बिना फिलहाल कोई दूसरा विकल्प फिर से शुन्य तक पहुंचा सकता था। भविष्य में जनता का आशीर्वाद कितना मिलेगा, मालूम नहीं। परन्तु खुद के स्टेप से शुन्य तक पहुंचने का विकल्प खोलना उचित नहीं था। इतिहास की घटनाओं से यही मैंने सबक ली है। समुद्र मंथन से अमृत और ज़हर दोनों निकलता है। कुछ लोगों को तो ज़हर पीना ही पड़ता है। वर्तमान के निर्णय से परिवारवाद का आरोप मेरे उपर लगेगा। यह जानते/समझते हुए भी निर्णय लेना पड़ा, जो मेरे लिए ज़हर पीने के बराबर था। फिर भी मैंने ऐसा निर्णय लिया। पार्टी को बनाए/बचाए रखने की जिद्द को मैंने प्राथमिकता दी। अपनी लोकप्रियता को कई बार जोखिम में डाले बिना कड़ा/बड़ा निर्णय लेना संभव नहीं होता। सो मैंने लिया।
पूर्वाग्रह से ग्रसित आलोचकों के लिए बस इतना ही
उपेन्द्र कुशवाहा ने आगे लिखा है कि, "सवाल ज़हर का नहीं था, वो तो मैं पी गया। तकलीफ़ उन्हें तो बस इस बात से है कि मैं फिर से जी गया ।।" अरे भाई, रही बात दीपक प्रकाश की तो जरा समझिए - विद्यालय की कक्षा में फेल विद्यार्थी नहीं है। मेहनत से पढ़ाई करके कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री ली है, पूर्वजों से संस्कार पाया है उसने। इंतजार कीजिए, थोड़ा वक्त दीजिए उसे। अपने को साबित करने का। करके दिखाएगा। अवश्य दिखाएगा। आपकी उम्मीदों और भरोसा पर खरा उतरेगा। वैसे भी किसी भी व्यक्ति की पात्रता का मूल्यांकन उसकी जाति या उसके परिवार से नहीं, उसकी काबिलियत और योग्यता से होना चाहिए।