बात दोस्ती की हो तो सबसे पहले लोगों के जेहन में साल 1975 के दौरान रीलीज हुई फिल्म शोले आ जाती है। यह फिल्म 'जय' (अमिताभ बच्चन) और 'वीरू' (धर्मेंद्र) नाम के दो अपराधियों की दोस्ती पर केंद्रित है। बिहार की राजनीति में नीतीश और लालू की जोड़ी को एक जमाने में 'जय-वीरू' की जोड़ी ही कहा जाता था, लेकिन उनकी दोस्ती की शुरुआत 'शोले' फिल्म से एक साल पहले यानी साल 1974 में हो गई थी।
बता दें कि साल 1974 के दौरान जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में ये दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। उस वक्त नीतीश कुमार 24 साल के थे, जबकि लालू यादव 27 साल के। नीतीश कुमार पटना यूनिवर्सिटी के बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे थे और लालू प्रसाद पटना कॉलेज में। नीतीश कुमार समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर से प्रभावित थे तो लालू प्रसाद जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति से। हालांकि, दोनों का मकसद एक ही था, सत्ता के खिलाफ आंदोलन। ऐसे में दोनों में दोस्ती हो गई, जो 1994 तक बरकरार रही।
गौरतलब है कि कॉलेज के दिनों में लालू बड़े छात्र नेता थे और चुनाव जीतने में भी वह नीतीश से सीनियर रहे। लालू 1977 में ही लोकसभा के सदस्य बन गए, लेकिन 1980 में लोकसभा चुनाव हार गए। हालांकि, विधानसभा चुनाव में उन्हें जीत हासिल हो गई। उस वक्त तक नीतीश कुमार लगातार दो चुनाव हार चुके थे। वहीं, 1985 में लालू और नीतीश एक साथ विधानसभा पहुंचे। अहम बात यह है कि व्यक्ति और राजनेता के रूप में लालू-नीतीश एक-दूसरे के विपरीत हैं। नीतीश बेहद नाप-तौलकर बोलते हैं, जबकि लालू जो महसूस करते हैं, तुरंत मुंह पर बोल देते हैं। जब 1988 में कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया और नेता प्रतिपक्ष बनने की बारी आई तो नीतीश ने लालू के लिए जबर्दस्त लॉबिंग की। दरअसल, भविष्य में बिहार का मुख्यमंत्री वही बनता, जो नेता प्रपिपक्ष होता। ऐसे में नीतीश कुमार ने मोर्चा संभाला। एक-एक करके तमाम विधायकों को लालू के पक्ष में ला दिया। गौर करने वाली बात यह है कि 1990 में नीतीश कुमार जैसा सारथी अगर लालू को नहीं मिलता तो उनके लिए मुख्यमंत्री पद दूर की कौड़ी रहता।
कहते हैं कि सत्ता के साथ कई बुराइयां भी साथ आती हैं। दरअसल, 90 के दशक में मंडल-कमंडल की राजनीति परवान चढ़ी और समाजवादी नेताओं ने दलित व पिछड़ों के लिए राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत की। 1991 लोकसभा चुनाव में लालू यादव के जनता दल ने 31 सीटों पर जीत हासिल की। उस दौरान नौकरियों में कथित तौर पर एक ही जाति को प्राथमिकता देने और ट्रांसफर-पोस्टिंग में भ्रष्टाचार की वजह से नीतीश और लालू के बीच दरार आने लगी। ऐसे में नीतीश कुमार ने 20 साल पुराना रिश्ता तोड़ दिया और बगावत का रास्ता चुना। पटना के गांधी मैदान में 12 फरवरी 1994 को हुई 'कुर्मी चेतना महारैली' नीतीश की बगावत की गवाह बनी। उस दौरान नीतीश ने 'भीख नहीं, हिस्सेदारी चाहिए' का नारा देकर अपनी ही पार्टी के भीतर आत्मसम्मान के लिए विरोध का बिगुल फूंक दिया और 10 साल के संघर्ष के बाद नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए।
यह बात सच है कि मुसीबत में सच्चा दोस्त जरूर काम आता है। ऐसे में जब नीतीश कुमार को जरूरत पड़ी तो 19 साल बाद लालू ने एक बार फिर उनसे हाथ मिला लिया। दरअसल, साल 2013 में नीतीश और लालू की गलबहियां करती तस्वीरें मीडिया में छा गई। वहीं, साल 2015 में इस दोस्ती ने मोदी लहर को नेस्तनाबूद करते हुए अपना 'किला' बचा लिया। इसके बाद लालू का 'दोस्त' बिहार का मुख्यमंत्री बन गया और नीतीश के 'दोस्त' का बेटा उपमुख्यमंत्री। लालू-नीतीश की दोस्ती की मिसालें दी जाने लगी। ठीक फिल्म 'शोले' के 'जय-वीरू' की तरह।
20 साल की दोस्ती के बाद लालू-नीतीश के बीच 19 साल तक दरार रही। राजनीतिक मकसद के लिए दोनों एक साथ जरूर आए, लेकिन यह दोस्ती करीब 4 साल ही चली और फिर उसमें खाई खिंच गई। लालू ने नीतीश पर धोखे का इल्जाम मढ़ा तो नीतीश ने लालू पर। कहा जाता है कि 19 साल की दरार के दौरान जब दोनों साथ नहीं थे, तब भी एक-दूसरे का ख्याल रखते थे, लेकिन अब हालात एकदम अलग हैं। लालू प्रसाद चारा घोटाले में सजायाफ्ता हैं और दिल्ली एम्स में इलाज करा रहे हैं। अब दोनों दोस्तों के बीच दरार इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है कि अपने खास दोस्त लालू की सेहत की जानकारी नीतीश कुमार अखबार से लेते हैं।