बिहार चुनाव में मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच माना जा रहा है। इन दोनों के चुनाव प्रचार पर गौर करने से ऐसा जाहिर होता है कि ये एक-दूसरे का डर दिखाकर लोगों से वोट मांग रहे हैं।
लालू प्रसाद की अगुवाई में एनडीए कथित जंगलराज की वापसी का डर दिखा रहा है। नरेंद्र मोदी ने तो चुनावों की घोषणा के पहले ही लालू की पार्टी आरजेडी का नया नामकरण ‘रोजाना जंगल राज का डर’ कर दिया था।
वहीं महागठबंधन के नेता, खासकर लालू लोगों को यह डर दिखा रहे हैं कि एनडीए सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी, अल्पसंख्यकों की जिंदगी और मुश्किल हो जाएगी। दोनों ही गठबंधन घोषित रूप से विकास के अलग-अलग वादों और नारों के साथ लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश में हैं। ऐसे में उन्हें डर की राजनीति की क्यों जरुरत क्यों पड़ी?
जानकारों का मानना है कि ऐसा करके लालू दरअसल वर्ष 1995 और भाजपा साल 2005 के दौर से आगे नहीं बढ़ पा रही है। वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष बताते हैं, ''राजनीतिक दलों को यह भरोसा नहीं है कि सिर्फ विकास का मुद्दा जीत दिला पाएगा। ऐसे में दलों को लगता है कि डर की राजनीति के सहारे मतों का ध्रुवीकरण कर जीत मिल सकती है।''