ओंकारेश्वर में पहली बार आधुनिक स्कूबा डाइविंग से नर्मदा की गहराई का निरीक्षण किया गया। गोताखोर यासिर हसीब करीब 210 फीट नीचे पहुंचे। वर्ष 2004 में यहां 350 फीट गहराई बताई गई थी। पुराने और वर्तमान आंकड़ों के अंतर ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण की जरूरत बढ़ाई है।
तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में पहली बार मां नर्मदा की गहराई का अत्याधुनिक संसाधनों से लैस प्रोफेशनल स्कूबा डाइविंग के माध्यम से निरीक्षण किया गया। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के ठीक सामने और झूला पुल के नीचे स्थित नर्मदा के प्राकृतिक गहरे जलभराव में भोपाल से पहुंची पायनियर वॉटर स्पोर्ट्स की टीम ने नदी तल की वास्तविक स्थिति जानने का प्रयास किया। टीम के पीएडीआई गाइड और मास्टर इंस्ट्रक्टर यासिर हसीब करीब 210 फीट की गहराई तक पहुंचे और विशेष टॉर्च की रोशनी में नदी तल का निरीक्षण किया।
यह स्थान केवल नदी का सामान्य हिस्सा नहीं, बल्कि ओंकारेश्वर की धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण जलक्षेत्र माना जाता है। स्थानीय नाविक लंबे समय से इस स्थान की गहराई 300 से 350 फीट तक बताते रहे हैं। मां रेवा मांझी नाविक संघ के अध्यक्ष भोलाराम केवट के अनुसार, वर्ष 2004 में ओंकारेश्वर बांध के निर्माण के दौरान ब्रह्मपुरी क्षेत्र में निर्माण कार्य शुरू होने पर संबंधित कंपनी ने यहां की गहराई मापी थी। उस समय गहराई करीब 350 फीट बताई गई थी।
वहीं, 2026 में हुए स्कूबा डाइविंग निरीक्षण के दौरान गोताखोर करीब 210 फीट तक पहुंचे। पुराने और वर्तमान आंकड़ों में करीब 140 फीट का अंतर दिखाई दे रहा है। हालांकि, इस अंतर की पुष्टि वैज्ञानिक जांच के बाद ही हो सकती है। यदि गहराई में कमी की बात प्रमाणित होती है तो यह प्राकृतिक जलभराव के अस्तित्व और भविष्य से जुड़ा गंभीर पर्यावरणीय सवाल बन सकता है।
पायनियर वॉटर स्पोर्ट्स, भोपाल की टीम के पीएडीआई गाइड और मास्टर इंस्ट्रक्टर यासिर हसीब करीब 210 फीट की गहराई तक पहुंचे। उन्होंने विशेष टॉर्च की मदद से नदी तल का निरीक्षण किया। इतनी गहराई पर पानी का दबाव काफी अधिक होता है। ऐसे में डाइविंग के दौरान सुरक्षा प्रक्रियाओं और निर्धारित सेफ्टी स्टॉप का पालन करते हुए गोताखोर को सुरक्षित सतह पर वापस लाया गया। विशेषज्ञ के अनुसार, इस तरह की डाइविंग के लिए विशेष प्रशिक्षण, उपकरण और गैस की आवश्यकता होती है। एक डाइव में करीब 10 से 12 हजार रुपये तक की गैस खर्च होने की जानकारी भी दी गई।
पत्थरों के बीच दिखाई दीं मूर्तियां और सिक्के
डाइविंग के दौरान नदी तल पर पत्थरों के बीच कुछ मूर्तियां, सिक्के और छोटे पौधे दिखाई देने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, किसी तरह के आभूषण या कीमती वस्तु मिलने की बात सामने नहीं आई। नदी के भीतर बड़ी मात्रा में गंदगी भी दिखाई नहीं देने की जानकारी दी गई। नदी तल पर मिली मूर्तियां और सिक्के शोध का विषय हो सकते हैं। ये कितने पुराने हैं, इनका धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है और ये नदी तल तक कैसे पहुंचे, इसका पता पुरातत्व विशेषज्ञों की जांच के बाद ही चल सकेगा।
अब प्रशिक्षित स्कूबा डाइवर के आधुनिक उपकरणों के साथ करीब 210 फीट तक पहुंचने के बाद नदी की वास्तविक गहराई को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। क्या पिछले दो दशकों में नर्मदा की गहराई में करीब 140 फीट तक कमी आई है? क्या नदी तल में मलबा जमा होने से प्राकृतिक गहराई कम हुई है या पुराने समय में गहराई का अनुमान अलग पद्धति से लगाया गया था? इन सवालों का जवाब वैज्ञानिक सर्वेक्षण से ही मिल सकता है।
प्राकृतिक जलभराव के अस्तित्व पर मंडरा रहा संकट
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के ठीक सामने स्थित यह प्राकृतिक गहरा जलभराव सदियों से नर्मदा की धारा और ओंकारेश्वर की प्राकृतिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। स्थानीय स्तर पर आशंका जताई जाती रही है कि ओंकारेश्वर बांध के निर्माण और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में हुई खुदाई से निकला मलबा कई स्थानों पर नदी क्षेत्र में पहुंचता रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, अत्यधिक बारिश और बांध के गेट खुलने के दौरान खुदाई तथा बांध के नीचे सुधार कार्यों से निकला मलबा प्राकृतिक जलभराव में जमा हो सकता है। इससे नदी तल ऊंचा होने और गहराई कम होने की आशंका है। इसके अलावा आसपास के पर्वतों की कटाई और निर्माण कार्यों से निकलने वाले पत्थर, मिट्टी और अन्य सामग्री के नदी क्षेत्र में पहुंचने की स्थिति की भी वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
प्राकृतिक जलभराव केवल पानी की गहराई तक सीमित नहीं है। इससे नदी की धारा, जलीय जीवन, नदी तल की संरचना, धार्मिक मान्यताएं और ओंकारेश्वर की भौगोलिक पहचान भी जुड़ी हुई है। इसलिए गहराई में कमी की आशंका की वास्तविकता और उसके कारणों का पता लगाना जरूरी है।
2004 और वर्तमान स्थिति की वैज्ञानिक जांच जरूरी
स्थानीय स्तर पर वर्ष 2004 में इस स्थान की गहराई करीब 350 फीट होने की बात कही जाती रही है। वहीं, वर्तमान स्कूबा डाइविंग निरीक्षण में करीब 210 फीट तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है। दोनों आंकड़ों में लगभग 140 फीट का अंतर है।
हालांकि, पुराने आंकड़े किस उपकरण, किस स्थान और किस वैज्ञानिक पद्धति से लिए गए थे, इसका आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आना बाकी है। इसलिए इसे अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय विस्तृत सर्वेक्षण का आधार बनाया जाना चाहिए। यदि संबंधित विभाग पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध कराएं और उसी स्थान पर आधुनिक सोनार या हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण के माध्यम से वर्तमान गहराई मापी जाए तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
केवल गहराई नहीं, नदी तल का भी होना चाहिए सर्वेक्षण
इस निरीक्षण से नदी तल के व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण की आवश्यकता भी सामने आई है। इसके माध्यम से पता लगाया जा सकता है कि नदी तल में कितनी मात्रा में प्राकृतिक गाद, पत्थर, निर्माण मलबा या अन्य सामग्री जमा हुई है। साथ ही, पिछले वर्षों में नदी तल की ऊंचाई में कितना परिवर्तन आया है, इसका तुलनात्मक अध्ययन भी किया जा सकता है। इसके लिए जल संसाधन विभाग, पर्यावरण विशेषज्ञों और भू-वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम बनाई जा सकती है। जरूरत पड़ने पर पुरातत्व विशेषज्ञों को भी इस अध्ययन में शामिल किया जा सकता है।
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आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण की भी जरूरत
ओंकारेश्वर में मां नर्मदा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। ज्योतिर्लिंग, नर्मदा के घाट, पर्वत और नदी की प्राकृतिक संरचना मिलकर इस तीर्थ की विशिष्ट पहचान बनाते हैं। विकास कार्यों के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि निर्माण और खुदाई से निकलने वाला मलबा नदी के प्राकृतिक प्रवाह या गहरे जलभराव को प्रभावित न करे। नदी में मलबा पहुंचने की किसी भी संभावना को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था और नियमित निगरानी की आवश्यकता है।
ओंकारेश्वर में पहली बार अत्याधुनिक स्कूबा डाइविंग के माध्यम से करीब 210 फीट की गहराई तक पहुंचना महत्वपूर्ण घटना है। इस निरीक्षण ने नदी की गहराई, नदी तल की स्थिति और प्राकृतिक जलभराव के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
अब जरूरत है कि इस प्रारंभिक निरीक्षण को आधार बनाकर संबंधित विभाग विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराएं। वर्ष 2004 में बताई गई गहराई और वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए। नदी तल में जमा सामग्री की प्रकृति और मात्रा का पता लगाया जाए। साथ ही, यह भी जांच की जाए कि आसपास की खुदाई और निर्माण गतिविधियों का मलबा इस प्राकृतिक जलभराव में पहुंचा है या नहीं।
मां नर्मदा की यह गहराई केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि ओंकारेश्वर की प्राकृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखी जाने वाली धरोहर से जुड़ा विषय है। इसकी वास्तविक स्थिति सामने लाना और प्राकृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखने के उपाय करना जरूरी है।