जमुई जिले के अलीगंज प्रखंड के इस्लामनगर गांव का नाम आज शैलेश कुमार की वजह से देशभर में गूंज रहा है, पर इस गौरव के पीछे वर्षों का संघर्ष छिपा है। बचपन से ही दाहिने पैर से पोलियो प्रभावित शैलेश का सफर आसान नहीं था। पिता शिवनंदन यादव मामूली किसान हैं और मां प्रतिमा देवी गृहिणी। खेत की आमदनी से किसी तरह घर चलता है। ऐसे में बेटे की पढ़ाई और खेलों का खर्च उठाना परिवार के लिए चुनौती था। मां प्रतिमा देवी बताती हैं कि शैलेश को बचपन में इलाज के लिए पटना और नवादा तक ले जाया गया।
शैलेश के पास स्पोर्ट्स शू तक नहीं थे
खेल के शुरुआती दिनों में शैलेश के पास स्पोर्ट्स शू तक नहीं थे। गांव के खेतों में नंगे पांव दौड़ना ही उनकी ट्रेनिंग का हिस्सा बना। 2017 में जब उन्होंने जयपुर में नैशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में नंगे पांव दौड़कर ब्रॉन्ज मेडल जीता, तो यह उनके संघर्ष का पहला बड़ा सबूत था। शैलेश की पढ़ाई के लिए पिता ने दो बीघा जमीन गिरवी रख दी और कर्ज लिया। नाना-नानी ने भी हर कदम पर आर्थिक मदद की। बड़े भाई कौशल कुमार, जो बिहार पुलिस में कार्यरत हैं, ने शैलेश के खेल करियर को आगे बढ़ाने में लगातार हौसला दिया।
विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में पदक जीतना बड़ी उपलब्धि
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शैलेश की इस उपलब्धि पर गांव में हर्ष का माहौल
शैलेश की इस उपलब्धि से इस्लामनगर गांव से लेकर प्रखंड और जिला में हर्ष का माहौल है। पंचायत के मुखिया, सरपंच, समाजसेवी और ग्रामीणों ने उन्हें बधाई दी है। साथ ही उनके उज्जवल भविष्य की कामना भी की है।