जहां मुंगेर जिले में 4 मार्च को होली की धूम रहेगी, वहीं यहां के असरगंज प्रखंड की सजुआ पंचायत का एक गांव ऐसा भी है, जहां ऐसा कुछ नहीं होगा। इसके पीछे वजह है यहां पिछले लगभग 400 वर्षों से चली आ रही होली नहीं मनाने की परंपरा। दरअसल, यह गांव ‘सती स्थान’ के नाम से जाना जाता है। यहां फागुन के पूरे महीने न तो रंग-गुलाल उड़ता है और न ही पुआ-पकवान बनते हैं।
400 साल पुरानी है परंपरा
ग्रामीणों ने आगे क्या बताया?
कहा जाता है कि महिला की मृत्यु के कुछ दिनों बाद गांववालों ने उसकी पुत्री से जूठे बर्तन मंगवाए। तभी कथित रूप से अनहोनी हुई और पुत्री भी अग्नि में समा गई। जहां मां-बेटी की समाधि बनी, वही स्थान आज सती स्थान मंदिर के रूप में पूजनीय है। ग्रामीण दुर्गी यादव, कपिल देव सिंह, शंकर यादव, कंपनी यादव और सुभाष यादव ने बताया कि उन्हें याद नहीं कि गांव में कभी होली खेली गई हो। कुछ वर्ष पूर्व एक व्यक्ति ने होली पर मालपुआ बनाने की कोशिश की, तो कढ़ाई से तेल उछलकर छप्पर में आग लग गई और घर जल गया। इसे लोग इस मान्यता से जोड़ते हैं।