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कोविद को राज्यपाल बना भाजपा ने खेला दलित कार्ड

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सूबे के हिस्से में एक और प्रदेश का राजभवन आ गया है। केंद्र सरकार ने भाजपा के वरिष्ठ नेता रामनाथ कोविद को बिहार का राज्यपाल बनाया है। कल्याण सिंह और केशरी नाथ त्रिपाठी को पहले ही राजस्थान और पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया जा सकता है।
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इस तरह कोविद भाजपा के ऐसे तीसरे शख्स हैं, जिन्हें किसी राज्य के संवैधानिक प्रमुख की कुर्सी सौंपी गई है। कानपुर के झींझक के रहने वाले कोविद भाजपा में विभिन्न पदों पर रहे चुके हैं और दलित वर्ग से आते हैं।

कोविद के राज्यपाल बनने के बाद इस समय उत्तर प्रदेश से चार लोग राज्यपाल हो गए हैं। कल्याण, केशरी और कोविद के अलावा रामनरेश यादव मध्य प्रदेश के राज्यपाल हैं। कोविद को बिहार का राज्यपाल बनाकर भाजपा ने बिहार और उत्तर प्रदेश में एक साथ दलित कार्ड खेला है।
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साथ ही कोविद को राज्यपाल बनाकर भाजपा ने संदेश देने की कोशिश की है कि वही उनकी सच्ची हितैषी है। कोविद के जरिये भाजपा ने दलितों पर डोरे डाले हैं।
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यह है वजह

भाजपा के रणनीतिकार जानते हैं कि बिहार में मुकाबला नीतीश कुमार, लालू यादव जैसे पिछड़ी जाति के राजनीति करने वालों से हैं तो  उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव जैसे नेता से लड़ाई लड़नी है। साथ ही मायावती से भी मुकाबला करना होगा।

इस लड़ाई में भाजपा की मजबूती तभी होगी जब वह दलितों को अपने पक्ष में लामबंद कर ले।  उत्तर प्रदेश में कोविद की स्वजाति कोरी समाज की आबादी दलितों में लगभग तीन प्रतिशत मानी जाती है। बुंदेलखंड में तो दलित समाज में कोरी समाज की आबादी ही सबसे अधिक है।

कायदे-कानून का दबाव
कानपुर की झींझक के रहने वाले कोविद संगठन के विभिन्न पदों पर रहे चुके हैं। राजनीति में आने से पहले वह सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करते थे। माना जाता है कि भाजपा ने उन्हें वहां भेजकर लालू और नीतीश कुमार जैसे नेताओं पर कायदे-कानून का दबाव बनाने की भी कोशिश की है।

वैसे तो अब भी केशरी नाथ त्रिपाठी को वहां का प्रभारी बनाकर ऐसा ही संदेश देने की कोशिश की है। पर, अब उसने वहां के लिए कायदे-कानून का दबाव बनाए रखने को कोविद को राज्यपाल बनाकर वहां भेजा है।

इन पदों पर रहे चुके
कोविद वर्ष 1991 में पहली बार भाजपा के जरिये राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हुए। पार्टी ने उन्हें भाजपा अनुसूचित मोर्चे का प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश महामंत्री बनाया। कोविद को तीन बार पार्टी के अनुसूचित मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। वह पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रहे। पार्टी ने उन्हें दो बार राज्यसभा का सदस्य बनाया। एक बार वह झींझक से ही विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं।
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