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करोडपति की जिंदगी में भी 'कसक' है

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अमिताभ बच्चन के क्विज शो 'कौन बनेगा करोडपति' में पांच करोड रुपए का इनाम जीतने वाले सुशील ने आज तक कार नहीं खरीदी, बिग बॉस में शामिल होने और चुनाव लडने से भी इनकार कर दिया।
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पटना से लगभग 170 किलोमीटर दूर मोतिहारी में तीन साल पहले तब खुशी की लहर दौड गई थी, जब सुशील कुमार ने ‘कौन बनेगा करोडपति’ में जैकपॉट जीता था।

रातों-रात सुशील कुमार और उनके साथ-साथ मोतिहारी भी दुनिया भर में सुर्खियों में आ गया था।

चुनाव के इस मौसम में सुशील के लिए लोकतंत्र के मायने क्या हैं? करोडपति बनने के बाद उनकी जिंदगी में क्या बदलाव आए हैं? कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब जानने के लिए मैं उनसे मिलने मोतिहारी पहुंचा।

आम आदमी

मोतिहारी में फोन पर संपर्क करने पर सुशील ने बताया कि वे घर पर नहीं हैं। इसके बाद मुझसे मिलने के लिए वो खुद ही शहर के हेनरी बाजार इलाके में पहुंचे।

हल्के रंग की धारीदार कमीज और जींस पहने सुशील स्कूटर से आए थे। पांच करोड रुपए के मालिक का कार से नहीं चलना उत्सुकता पैदा करने वाला था। खासतौर पर एक ऐसे भारतीय समाज में जहां पैसा आते ही घर में कार आ जाती है। घर में रखने की जगह न हो तो सडकों पर, गलियों में पार्क की जाती है।

ऐसे में सुशील से हमारा पहला सवाल यही था कि क्या वे 'बे-कार' हैं। तो सुशील ने बताया कि स्कूटी भी उन्होंने 2013 में ही खरीदी है, वह भी दोस्तों और घरवालों के बहुत दबाव बनाने पर। केबीसी का जैकपॉट जीतने के बाद भी वे कई महीने साइकिल पर ही शहर नापा करते थे।

चुनाव के मौसम में लगभग सभी दल कई सीटों पर पुराने नेताओं-कार्यकर्ताओं को टिकट देने के बदले जिताऊ चेहरों को मौका दे रहे हैं।

मशहूर होने के बाद सुशील के लिए भी यह पहला चुनाव है। सुशील ने बताया कि आम आदमी पार्टी ने उनसे मोतिहारी से लोकसभा चुनाव लडने का आग्रह किया था। इसके बाद वे पार्टी के नेताओं से मिले भी, लेकिन अंततः घर वालों और मित्रों की सलाह पर उन्होंने इनकार कर दिया।

संपादक भी बने

सुशील आजकल सुर्खियों में नहीं हैं जबकि 2011 में वे कई महीने लगातार चर्चा में बने रहे थे। सुशील बताते हैं कि लोकप्रियता का आलम यह था कि विदेशों से ऐसे पत्र आते थे जिन पर पते की जगह लिखा था, ‘सुशील कुमार, केबीसी विनर, इंडिया’ और चिट्ठी मिल जाया करती थी।

केबीसी का जैकपॉट जीतने के बाद वे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार सुरक्षा कानून यानी मनरेगा के ब्रांड एंबेसडर बने। सुशील ने जब क्विज शो जीता था, तब वे मनरेगा योजना चलाने वाले विभाग में मामूली नौकरी कर रहे थे।

साथ ही दिसंबर 2011 में एक दिन के लिए क्षेत्रीय अखबार प्रभात खबर के अतिथि संपादक भी बने। इसी दौरान उन्होंने बिग बॉस में शामिल होने से इनकार किया।

2012 में वे डांस शो 'झलक दिखला जा' का हिस्सा बने।

सुर्खियों से परे जिंदगी

सुशील कहते हैं, ''सिर्फ चर्चा में बने रहने के लिए बयानबाजी करना या कुछ भी कर गुजरना मेरी फितरत नहीं है, लेकिन चर्चा में नहीं रहते हैं, तो कुछ कमी सी भी महसूस होती है।''

सुशील अब खुद को इस बात से तसल्ली दे लेते हैं कि अब वे जहां जाते हैं, उनकी बात सुनी जाती है, उनके विचारों को समाज में महत्व मिलता है।

क्या करोडपति बनने से उनके सपने पूरे हो गए? इस सवाल के जवाब में सुशील कहते हैं कि पैसों से उनकी जरूरतें तो पूरी हो गई हैं, जीवन आर्थिक मोर्चे पर निश्चिंत हो गया है।

अब मोतिहारी में उनका अपना मकान है। केबीसी के पैसों के बडे हिस्से का सुरक्षित निवेश उन्होंने बैंक में किया है। इससे जो ब्याज मिलता है, वह उनके परिवार की छोटी-बडी जरूरतें पूरी करने के लिए काफी है।

बदलते लक्ष्य

मनरेगा के तहत काम करते हुए सुशील प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी भी करते थे। आईएएस बनना उनका सपना था। केबीसी जीतने के कुछ दिनों बाद उन्होंने फिर से इसके लिए कमर कसी।

दिल्ली भी गए, लेकिन बकौल सुशील उनकी लोकप्रियता ने अब उन्हें एक आम छात्र नहीं रहने दिया था।

दिल्ली यह सोचकर गए थे कि दो साल में लक्ष्य हासिल कर लेंगे, लेकिन अपनी लोकप्रियता की वजह से शांत होकर दो महीने भी तैयारी नहीं कर सके और घर लौट आए।

फिर लेक्चरर बनने के लिए तैयारी शुरू की। राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा देने की खबर मीडिया को लगी तो वे कुछ ऐसे शीर्षक के साथ वह खबर बने, ‘आईएएस बनने वाला अब आईएएस बनाएगा’।

यह उन्हें तंज जैसा लगा और फिर इससे भी मन उचट गया। फिर लेखन के क्षेत्र में मुंबई किस्मत आजमाने पहुंचे, तो वहां कहा गया कि उनके चेहरे को तुरंत काम मिल सकता है, दिमाग को मुकाम हासिल करने के लिए संघर्ष करना पडेगा। एक महीने बाद वे मुंबई से भी लौट आए।

फिलहाल सुशील अपने घर पर ही हैं। केबीसी के बाद उन्होंने अपने लिए कई लक्ष्य निर्धारित किए। नाकाम रहे और फिलहाल लक्ष्यविहीन होकर रह गए हैं।

यहां यह बताते चलें कि सुशील की मनपसंद फिल्म गुरुदत्त की 'प्यासा' है।
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लोकतंत्र के मायने

उनके विचार में लोकतंत्र में ज्यादातर काम जनता की भलाई के लिए किए जाते हैं। हर कोई अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनने के लिए वोट कर सकता है और हर वोट का महत्व बराबर है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक बराबरी आना अभी बाकी है और ऐसा होने पर ही हमारा लोकतंत्र पूरी तरह सफल माना जाएगा।

मत देने से, चुनावी प्रक्रिया से क्या बदलाव आते हैं?

इस सवाल पर वह कहते हैं, ''मत डाल देने भर से बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आता। सरकारें जरूर बदल जाती हैं। मनपसंद उम्मीदवार और सरकार चुनने भर से जिंदगी में सारे अपेक्षित बदलाव नहीं आ जाते हैं। सरकारें अपने ढंग से काम करती हैं, चाहे जो भी हो।''

सुशील कुमार का कहना है, ''हमें बहुत आजादी है। हम अपना मनपसंद पेशा चुन सकते हैं, मन की बात बोल सकते हैं, लेकिन हमारी अब तक की सरकारें जनता की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतरी हैं। फिर भी आसपास के देशों की ओर नजर उठाकर देखता हूं, तो उनके मुकाबले हमारा लोकतंत्र ज्यादा सफल नजर आता है।''
सरकार से अपेक्षा

वो कहते हैं, "सांसद का व्यक्तिगत स्वभाव और प्रदर्शन मायने रखता है। साथ ही सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री का भी कर्मठ होना जरूरी है। सरकारों को दूरदृष्टि रखनी चाहिए और ऐसा काम करना चाहिए जिससे दुनिया में देश का नाम रोशन हो।"

हमने पूछा कि जनप्रतिनिधि और सरकारें कब विफल रहती हैं?

सुशील कुमार कहते हैं कि सरकारें तब विफल रहती हैं जब वे किसी भी कारण से अपने वादे पूरे नहीं कर पातीं। वादे पूरे करने के लिए संसद में कानून नहीं बना पाती हैं।
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