आईपीएस अधिकारी कृष्ण स्वरूप द्विवेदी को बिहार का अगला पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी बनाए जाने पर विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। नीतीश सरकार ने फैसला किया है कि कृष्ण स्वरूप द्विवेदी आज सेवानिवृत हो रहे पुलिस महानिदेशक पीके ठाकुर का स्थान लेंगे।
केएस द्विवेदी के कार्यकाल के दौरान 1989 के अक्टूबर में भागलपुर में सांप्रदायिक दंगे भड़के थे। भागलपुर के एसपी के रूप में उनका कार्यकाल विवादित रहा था।1984 बैच के बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी द्विवेदी मूल रूप से उत्तर प्रदेश से हैं। उनका गृह जिला जालौन है।
वे अभी बिहार में डीजी (ट्रेनिंग) के पद पर तैनात हैं। द्विवेदी अगले साल 31 जनवरी को रिटायर होंगे।
'संघ मुख्यालय की इच्छा पर नियुक्ति'
उनकी नियुक्ति पर अपनी प्रतिक्रिया में राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने बीबीसी से कहा, "केएस द्विवेदी का डीजीपी नियुक्त होना अपने आप में इस बात की दोबारा पुष्टि करता है कि सरकार के महत्वपूर्ण नीतिगत और प्रशासनिक निर्णयों में नीतीश कुमार या जदयू की अब कोई भूमिका नहीं रही है।"
"उन्हें अब वो ही करना पड़ रहा है जो नागपुर के संघ मुख्यालय की इच्छा होगी। तत्कालीन एसपी के रूप में 1989 के बर्बर भागलपुर दंगों के दौरान इनकी भूमिका किसी से छिपी नहीं है। उस समय के समाचार पत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स देखें तो स्पष्ट होता है कि क्यों तात्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने इन्हें वहां से हटाने का निर्णय किया था।"
"संघ की दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा से इनकी निकटता इनकी कार्यशैली में तब से लेकर अब तक साफ है। इस महत्वपूर्ण पद पर इनकी नियुक्ति हाशिए के लोगों और अल्पसंख्यक समाज में एक डर और ख़ौफ की भावना को जन्म देगी।"
विपक्ष के आरोपों के जवाब में जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नीरज कुमार विपक्ष से यह सवाल करते हैं, "अगर ऐसी कोई बात थी तो राष्ट्रीय जनता दल की सरकारों ने उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की।"
"उनकी नियुक्ति वरीयता के आधार पर हुई है। इसे दंगों से जोड़कर देखना महज एक राजनीतिक बयान है और कुछ नहीं। नीतीश कुमार की सरकार ने सांप्रदायिक उन्माद और क़ानून के राज के सवाल पर न कभी राजनीतिक समझौता किया है और न करेगी।"
आयोग ने माना जिम्मेदार
सन 1989 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा के कार्यकाल में यह दंगा हुआ था। इस घटना के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद भी छोड़ना पड़ना। इसके बाद कांग्रेस ने डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र को राज्य की बागडोर सौंपी। उन्होंने भागलपुर दंगे की जांच के लिए जस्टिस रामानंद प्रसाद कमीशन का गठन किया। कुछ ही महीनों बाद सरकार बदल गई। लालू प्रसाद की सरकार ने इस आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया।
जस्टिस शम्सुल हसन और आरसीपी सिन्हा भी आयोग के सदस्य बनाए गए। साल 1995 में अध्यक्ष और सदस्यों द्वारा अलग-अलग रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। इसी साल मॉनसून सत्र में तत्कालीन लालू सरकार ने इसे विधान परिषद में पेश भी किया।
जिस दिन यह रिपोर्ट विधान परिषद में पेश की गई उस दिन वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद वहां मौजूद थे। वह बताते हैं, "सरकार ने केवल सदस्यों वाली रिपोर्ट ही स्वीकार की थी। जस्टिस शम्सुल हसन और आरसीपी सिन्हा की रिपोर्ट में भागलपुर के तत्कालीन एसपी को भी दंगों के लिए जिम्मेदार माना गया था।"