आमतौर पर विधि-विरुद्ध किशोरों के विरुद्ध अदालतें रहम दिखाती हैं। अदालतों द्वारा उन्हें सुधरने का मौका दिया जाता है। इसका असर भी होता है और विधि-विरुद्ध किशोर सुधर भी जाते हैं। इसके बावजूद बिहार की एक अदालत ने विधि-विरुद्ध किशोर के विरुद्ध कड़ा फैसला सुनाया है। चूंकि अपराध बेहद गंभीर था। इसी वजह से कोर्ट ने यह कड़ा फैसला सुनाया।
दरअसल, औरंगाबाद के किशोर न्याय बोर्ड (जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड) के प्रधान दंडाधिकारी सह एसीजेएम सुशील प्रसाद सिंह की अदालत ने एक विधि-विरुद्ध किशोर को सजा सुनाई है। कोर्ट ने शुक्रवार को रफीगंज थाना कांड संख्या-242/22 में निर्णय पर सुनवाई करते हुए मामले के एकमात्र आवासित विधि-विरुद्ध किशोर को तीन साल कैद की सजा सुनाई। अधिवक्ता सतीश कुमार स्नेही ने बताया कि आवासित विधि-विरुद्ध किशोर आठ जुलाई 2022 से पर्यवेक्षण गृह, गया में संसीमित है। मामले को दिए फैसले में बोर्ड ने पर्यवेक्षण गृह, गया के अधीक्षक को एक पत्र निर्गत किया है। कहा है कि सज़ा पूरी करने के लिए आवासित विधि-विरुद्ध किशोर को विशेष सुधार गृह, पटना स्थानांतरित किया जाए।
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अधिवक्ता ने बताया कि आवासित विधि-विरुद्ध किशोर के खिलाफ भादंवि की धारा-376 तथा 06 प\क्सो एक्ट एवं एससी-एसटी एक्ट जैसे जघन्य आपराधिक धाराओं में मामला दर्ज था। मतलब विधि-विरुद्ध किशोर नाबालिग से दुष्कर्म, मारपीट और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने का आरोपी था। सारे आरोप बेहद गंभीर थे। इस वजह से कोर्ट ने मामले में रहम नहीं किया और बोर्ड ने यह आदेश देने के साथ ही विधिक सेवा प्राधिकार, औरंगाबाद के माध्यम से पीड़िता को चार लाख रुपये का प्रतिकर दिलाने को भी कहा है।
इस सजा को एक नजीर माना जा रहा है। इससे किशोर निसंदेह अपराध करने से तौबा करेंगे। फैसले से समाज को भी यह अच्छा संदेश गया है कि अपराध करने पर किशोर होने का फायदा नहीं उठाया जा सकता। गंभीर अपराध करेंगे तो सजा मिलेगी ही।