लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान बेशक बिहार में भाजपा-लोजपा गठबंधन की जीत के दावे कर रहे हों लेकिन ये भी स्वीकार करते हैं कि अपनी पार्टी में वह अकेले थे जो इस गठबंधन के पक्ष में नहीं थे लेकिन पार्टी के संसदी बोर्ड की बात माननी पड़ी।
उन्होंने कहा, ''हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा था। आरजेडी और कांग्रेस का व्यवहार अच्छा नहीं था। हमें वो दो-तीन सीटें देने पर भी राज़ी नहीं थे। एलजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य आरजेडी के साथ नहीं जाना चाहते थे, कांग्रेस के साथ भी नहीं। उनका सोचना था कि ये राजनीति में कुछ नहीं कर पाएंगे।''
पासवान ने कहा, ''हमने अकेले दम पर कोशिश की कि पुरानी सोच पर क़ायम रहें लेकिन जब हमने देखा कि पार्टी का दृष्टिकोण पार्टी और देश के हित में है तो हमने पार्लियामेंट्री बोर्ड के फ़ैसले को मान लिया।''
उनका दावा है कि बिहार में बीजेपी और एलजेपी गठबंधन 35 सीटें जीतने जा रहा है। राज्य में सबसे ज्यादा सीटें उन्हें मिलेंगी।
'आरजेडी को नुकसान होगा'
वह इन संभावनाओं का ख़ारिज करते हैं कि लालू यादव की आरजेडी को लोकसभा चुनावों में फ़ायदा होने जा रहा है। वह कहते हैं, ''पिछले चुनाव में भी यही माना जा रहा था कि आरजेडी की वापसी होगी, लेकिन ये ग़लत निकला।''
वह कहते हैं, ''एलजेपी के साथ नहीं होने से आरजेडी को हर सीट पर कम से कम एक लाख वोटों का नुक़सान होगा। फिर अल्पसंख्यकों का कुछ वोट भी जेडीयू की ओर चला जाएगा। लालू की सभा में जो भीड़ है, उसमें वोटर कितने हैं, कितने श्रोता और कितने दर्शक, कहना मुश्किल है।''
वह इनकार करते हैं कि 'बिहार में विकास' कोई मुद्दा है। दावा करते हैं कि सबसे ज्यादा दुगर्ति चुनावों में किसी की अगर होगी तो जेडीयू की। क्यों? इसका पता नहीं।
'सवाल पार्टी को बचाने का था'
उन्होंने कहा कि वह धर्मनिरपेक्षता से कभी नहीं हटे, वर्ष 2005 में ये वही थे, जिन्होंने बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री की बात कही थी, जिस पर उनकी पार्टी टूट गई। इसलिए सवाल पार्टी को बचाए रखने का भी था।
वह मानते हैं कि बीजेपी के साथ जाने पर परंपरागत मुसलमान वोटर उनसे नाराज़ हो सकता है। लेकिन पलटकर कहते हैं कि 17 साल तक बीजेपी के साथ रहे नीतीश कुमार आज सेकूलर बनने की कोशिश कर रहे हैं। पर मुसलमानों का कितना वोट उन्हें मिलेगा कहना मुश्किल है।
वह इन संभावनाओं का ख़ारिज करते हैं कि लालू यादव की आरजेडी को लोकसभा चुनावों में फ़ायदा होने जा रहा है। वह कहते हैं, ''पिछले चुनाव में भी यही माना जा रहा था कि आरजेडी की वापसी होगी, लेकिन ये ग़लत निकला।''
वह कहते हैं, ''एलजेपी के साथ नहीं होने से आरजेडी को हर सीट पर कम से कम एक लाख वोटों का नुक़सान होगा। फिर अल्पसंख्यकों का कुछ वोट भी जेडीयू की ओर चला जाएगा। लालू की सभा में जो भीड़ है, उसमें वोटर कितने हैं, कितने श्रोता और कितने दर्शक, कहना मुश्किल है।''
वह इनकार करते हैं कि 'बिहार में विकास' कोई मुद्दा है। दावा करते हैं कि सबसे ज्यादा दुगर्ति चुनावों में किसी की अगर होगी तो जेडीयू की। क्यों? इसका पता नहीं।
'सवाल पार्टी को बचाने का था'
उन्होंने कहा कि वह धर्मनिरपेक्षता से कभी नहीं हटे, वर्ष 2005 में ये वही थे, जिन्होंने बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री की बात कही थी, जिस पर उनकी पार्टी टूट गई। इसलिए सवाल पार्टी को बचाए रखने का भी था।
वह मानते हैं कि बीजेपी के साथ जाने पर परंपरागत मुसलमान वोटर उनसे नाराज़ हो सकता है। लेकिन पलटकर कहते हैं कि 17 साल तक बीजेपी के साथ रहे नीतीश कुमार आज सेकूलर बनने की कोशिश कर रहे हैं। पर मुसलमानों का कितना वोट उन्हें मिलेगा कहना मुश्किल है।