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फ्लैशबैकः जब बिहार ने 23 साल में देखे थे 22 मुख्यमंत्री

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पिछले ढाई दशक से बेशक बिहार की राजनीति में स्थायित्व बना हुआ है लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब देश की राजनीति को प्रभावित को करने वाली बिहार में भारी उथल पुथल का माहौल था। 60 के दशक से शुरू हुआ उथल-पुथल का यह दौर 80 के दशक में लालू यादव के उभार के बाद ही समाप्त हुआ।
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यह समय ऐसा था जब एक के बाद एक मुख्यमंत्री इस तरह बदले की 23 साल में बिहार की जनता को 28 मुख्यमंत्रियों से रूबरू होना पड़ा।

इसकी शुरूआत हुई केबी सहाय के मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद से लगभग साढ़े तीन साल मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस पार्टी के कृष्ण बल्लभ सहाय को महामाया प्रसाद सिन्हा के लिए कुर्सी छोड़नी पड़ी।

जन क्रांति दल के सिन्हा ने 5 मार्च 1967 को बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली और यहीं से बिहार की राजनीति में बदलावों का दौर शुरू हो गया। सिन्हा

बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे, लेकिन उन्हें सालभर से भी कम में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी और 28 जनवरी 1968 को उनकी बजाय कांग्रेस के सतीश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री बने। लेकिन वो भी मात्र पांच दिन ही इस कुर्सी पर टिक सके और 1 फरवरी को उन्हें भी पद से हटा दिया गया।
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उनकी बजाय बीपी मंडल मुख्यमंत्री बने लेकिन उनका कार्यकाल भी मात्र 31 दिनों का रहा और 2 मार्च को उन्हें भी पद से हटना पड़ा। इस बार सूबे की कमान संभाली कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री ने जो 22 मार्च 1968 को आठवें मुख्यमंत्री बने।

कांग्रेस के पतन से नए दलों ने लिया उभार

कांग्रेस में लगातार चलती गुटबाजी के कारण उन्हें भी मात्र 100 दिन में अपने पद से हाथ धोना पड़ा और 29 जून 1968 को सीएम के पद से उनकी भी विदाई हो गई। कांग्रेस में भारी गुटबाजी और मजबूत विपक्ष के अभाव के कारण बिहार में राजनीतिक अस्थिरता चरम पर पहुंच गई।

नतीजतन 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969 तक प्रदेश को पहली बार राष्ट्रपति शासन का मुंह भी देखना पड़ा। यह गतिरोध दूर हुआ 26 फरवरी को जब कांग्रेस के हरीहर सिंह ने नौवें मुख्यमंत्री के रूप में सूबे की कमान संभाली। लेकिन मात्र 117 दिन के शासन के बाद उन्हें भी इस पद से रुखसती झेलनी पड़ी।

हरीहर सिंह को पद से हटाकर कांग्रेस ने भोला पासवान शास्‍त्री को 22 जून 1969 को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन बदकिस्मती से शास्‍त्री भी मात्र 13 दिन तक सूबे की सत्ता संभाल सके और 6 जुलाई 1969 को कुर्सी छोड़नी पड़ी। इसके साथ ही राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की मुहर लग गई।

16 फरवरी 1970 को राष्ट्रपति शासन खत्म हुआ तो दरोगा प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। काफी उम्‍मीदों के साथ मुख्यमंत्री बनाए गए दरोगा प्रसाद सिंह भी सालभर इस पद पर नहीं रह सके और सोशलिस्ट पार्टी के कर्पूरी ठाकुर उन्हें हटाकर दूसरे गैर कांग्रेसी सीएम बने।

बिहार की राजनीति में विशिष्ट स्‍थान रखने वाले कर्पूरी ठाकुर को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी ज्यादा दिन रास नहीं आई और लगभग छह महीने बाद ही उन्हें पद से हटना पड़ा। उनकी जगह कांग्रेस के भोला पासवान ने तीसरी बार 2 जून 1971 को सत्ता संभाली।

चार बार देखना पड़ा राष्ट्रपति शासन का मुंह

सात महीने बाद ही फिर बिहार में राष्ट्रपति शासन की ‌स्थिति बन गई। 19 मार्च 1972 तक चले राष्ट्रपति शासन का अंत केदार पांडे के सत्ता संभालने के बाद हुआ। लेकिन कुछ दिन बाद ही उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा और 2 जुलाई 1973 को अब्दुल गफ्फार नए मुख्यमंत्री बने।

लगभग पौने दो साल तक शासन करने वाले अब्दुल गफ्फार भी बीच अधर में ही कुर्सी से उतार दिए गए और उनकी जगह 11 अप्रैल 1975 को जगन्नाथ मिश्रा नए मुख्यमंत्री बने। दो साल तक मुख्यमंत्री रहे जगन्नाथ मिश्रा की रुखसती भी विवादों के बीच हुई और उन्हें हटाकर प्रदेश में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

जेपी आंदोलन के बाद जनता पार्टी के गठन के साथ ही 24 जून 1977 को कर्पूरी ठाकुर एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने। दो साल से कुछ समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे कर्पूरी ठाकुर ने 21 अप्रैल 1979 को इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह राम सुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री बनाए गए।

बिहार में राजनीतिक गतिरोध जारी रहा और राष्ट्रपति शासन के साथ उन्हें भी अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। इसके बाद 14 अगस्त 1983 को मुख्यमंत्री बने चन्द्रशेखर सिंह भी इस पद पर अपने दो साल पूरे नहीं कर पाए। उनकी जगह कांग्रेस ने ‌बिंदेश्वरी दूबे को 12 मार्च 1985 को मुख्यमंत्री बनाया।
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लालू यादव के उदय के बाद खत्म हुई अस्थिरता

राजनीतिक गहमागहमी के इस दौर में बिंदेश्वरी दूबे सबसे ज्यादा समय तक अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे और वो लगभग तीन साल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। लेकिन 14 फरवरी 1988 को भगवत झा आजाद के कुर्सी संभालने के बाद उनकी भी इस पद से विदाई हो गई।

11 मार्च 1989 ‌को सत्येन्द्र नारायण सिन्हा ने उन्हें भी पद से बेदखल कर दिया और वो मुख्यमंत्री बने। हालांकि एक साल से भी कम समय के अंतर पर 6 दिसंबर 1989 में जगन्नाथ मिश्रा तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और मात्र 95 दिन ही इस पद पर रह पाए।

इसके बाद 90 के दशक की शुरूआत में चुनाव हुए तो आश्चर्यजनक रूप से एक युवा नेता के रूप में जेपी आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री के तौर पर बिहार की कुर्सी पर बैठे। इसके साथ ही सूबे की राजनीति में कुछ स्‍थायित्व का दौर आया। लेकिन इस बीच साल 1967 से 1990 तक 23 साल में बिहार ने कुल 22 मुख्यमंत्रियों का दीदार कर लिया।
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