Bihar Election 2020: जाति बिहार की राजनीति की सच्चाई है। पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस चुनाव में भी दलों के बीच जातीय समीकरण को साधने की होड़ है।
हालांकि जातीय समीकरण और सुशासन बनाम जंगलराज जैसे मुद्दों के बीच राज्य की सियासत में अरसे बाद रोजगार के सवाल भी तैर रहे हैं। चाहे सत्तारूढ़ राजग हो या फिर राजद की अगुवाई में विपक्षी महागठबंधन या कुशवाहा-ओवैसी की अगुवाई वाला गठबंधन, सभी दल जोरशोर से रोजगार के मुद्दे उठा रहे हैं और रोजगार के वादे कर रहे हैं।
कोरोना के कारण लॉकडाउन के दौरान महानगरों से लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों का पलायन हुआ। अमानवीय परिस्थितियों में पलायन के बाद राज्य में उद्योग-धंधे और रोजगार के सवाल को सियासत में जगह मिली है। दूसरा कारण राज्य में युवा मतदाताओं की बड़ी संख्या है। युवा मतदाताओं में 29 साल से कम उम्र के 1.77 करोड़ तो 39 साल से कम उम्र के 3.66 करोड़ मतदाता हैं।
जाति कामयाब फिर भी रोजगार का सवाल
सहज सवाल है कि जब सियासी दलों का काम जाति की जुगलबंदी से ही चल जाता है तो विकास और रोजगार जैसे मुद्दे को जगह क्यों ? दलों ने अपने-अपने हिसाब से जातिगत समीकरण की गोटी बिछाई है।
राजग की निगाहें अति पिछड़ा, अगड़ा और महादलित का तो विपक्षी महागठबंधन का यादव-मुस्लिम, दलित और कम संख्या वाली छोटी-छोटी बिरादरी पर है। राज्य में अलग-अलग जातियां अलग-अलग दलों के साथ खड़ी जरूर दिखती हैं, मगर इस बार इनके पास रोजगार से संबंधित सवाल भी हैं। राज्य में साढ़े चार लाख सरकारी पद खाली हैं। केंद्रीय स्तर पर सरकारी नौकरियों के लिए लंबे समय से वैकेंसी नहीं है। इससे सभी बिरादरी के युवा वर्ग में नाराज हैं।
पलायन ने खड़ा किया सवाल
अप्रैल महीने में जब लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों का महानगरों से पलायन हुआ तब पहली बार स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी, उद्योग-धंधों की कमी का सवाल उठा। पहली बार राज्य के लोगों के राष्ट्रीय औसत से बेहद कम आय, दस फीसदी से अधिक बेरोजगारी का सवाल शिद्दत से उठा।
काम के अभाव में पलायन करने वाले मजदूर वापस महानगरों का रुख कर रहे हैं। इससे भी एक माहौल बना है। गौरतलब है कि राज्य की प्रतिव्यक्ति आय 33629 रुपये है जो राष्ट्रीय औसत 92565 से बेहद कम है।
किसका क्या रुख
विपक्षी महागठबंधन से सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने सरकार बनने पर कैबिनेट की पहली बैठक में दस लाख रोजगार देने का वादा किया है। लोजपा के चिराग पासवान ने बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट का नारा दिया है।
भाजपा राज्य में उद्योग-धंधों का जाल बिछाने और विकास का वादा कर रही है। जदयू ने अपने निश्चय पत्र में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए महिलाओं-युवाओं को ऋण में भारी अनुदान और अत्याधुनिक कौशल प्रशिक्षण का वादा किया है। स्वालंबी बिहार के बूते नीतीश कुमार मैदान में हैं। ओवैसी-कुशवाहा के मोर्चे ने भी रोजगार पैदा कर पलायन को खत्म करने का भरोसा दिया है।
जंगलराज बनाम सुशासन
बिहार में डेढ़ दशक के दौरान सभी विधानसभा और लोकसभा चुनाव में सुशासन बनाम जंगलराज मुख्य मुद्दा रहा। इस बार सत्तारूढ़ राजग इसे इतनी गंभीरता से नहीं उठा रही है। राजग रोजगार और विकास की बात कर रहा है।
दरअसल बीते तीन दशक के दौरान बिहार में मतदाताओं की नई पीढ़ी आ गई है। ऐसी पीढ़ी जिनके पास कथित जंगलराज की यादें नहीं हैं। इसी प्रकार आभासी दुनिया से मित्रवत हो चुकी नई पीढ़ी कथित सुशासन से भी तालमेल नहीं बिठा पा रही। यह पीढ़ी विकसित राज्यों के साथ बिहार की तुलना करती है।
उम्मीदवारी से फिर मिलेगा मौका
हालांकि अधिकांश दलों ने बाहुबली व दागियों से इस चुनाव में भी गुरेज नहीं किया है लेकिन राजद में कई ऐसे दागी चेहरे हैं जिनकी उम्मीदवारी के बाद फिर से जंगलराज पर हमले का मौका सत्तारुढ़ गठबंधन को मिल सकता है। भले इस चुनाव में अभी तक स्थानीय मुद्दे हावी हैं लेकिन चुनाव प्रचार में पीएम नरेंद्र मोदी के कूदते ही मुद्दों और प्रचार का एजेंडा नये सिरे से से तय हो सकता है।