कई और नेता बागी होकर कर सकते हैं जद(यू) का नुकसान
दूसरे और तीसरे चरण के चुनाव में भी भाजपा के कई नेता बागी हो सकते हैं। संभावना यही बताई जा रही है कि इनमें से तमाम लोकजनशक्ति पार्टी का ही दामन थामेंगे। इसकी दो बड़ी वजह बताई जा रही है। पहली तो यह कि चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की लगातार तारीफ की है। दूसरा कारण जद(यू) के खाते में जाने वाली सीट पर लोजपा के टिकट से चुनाव लड़ने पर भाजपा के नेताओं समर्थकों का साथ मिलने की उम्मीद रहेगी। क्योंकि चिराग ने भाजपा के साथ बने रहने का वादा किया है। इस तरह से चिराग पासवान सबसे बड़ा खतरा जद(यू) के लिए ही साबित हो रहे हैं।
अभी तक भाजपा ने नहीं दिया संदेश, आगे भी संभावना कम
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते थे कि भाजपा, जद(यू) के बीच में सीटों का निर्धारण होने के बाद सहयोगी दल लोकजनशक्ति पार्टी को एनडीए से बाहर करने की घोषणा करे। भाजपा के चतुर रणनीतिकारों ने केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान के खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर नीतीश कुमार की जिद को टाल दिया था। अब पूर्व केन्द्रीय मंत्री भी नहीं रहे। ऐसे में भाजपा के सामने एक बड़ा असमंजस खड़ा हो गया है। वह बिहार में 110 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।
2015 में 157 सीटों पर लड़ी थी। इसलिए उसे इस बार 47 सीटें छोड़नी पड़ी और इनमें से लगभग सभी जद(यू) के खाते में गई हैं। पार्टी राम विलास पासवान के निधन के बाद बिहार में दलित वोटों की भी सहानुभूति का लाभ लेने का अवसर छोडने के मूड में नहीं है। यह नीतीश कुमार के लिए भी बड़े धर्म संकट की घड़ी है। प्रधानमंत्री ने खुद भी राम विलास पासवान को श्रद्धांजलि देते हुए अपना सच्चा दोस्त बताया है। चिराग की पीठ पर हाथ फेरा है। चिराग ने भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री शाह से मिले स्नेह के आधार पर ही भाजपा के साथ न केवल बने रहने का वादा किया, बल्कि सबकी तारीफ भी की है। चिराग ही वह शख्स हैं जो 2014 में राम विलास पासवान और लोजपा को भाजपा के साथ ले आए थे। ऐसे में नीतीश कुमार की इच्छा पूरी हो पाने की संभावना कम है।
प्रधानमंत्री की 20 रैलियां और नीतीश कुमार की उम्मीद
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिहार विधानसभा चुनाव के बाबत 20 जनसभाएं कर सकते हैं। कोविड-19 की चुनौती को देखते हुए यह रैली तमाम उपायों के साथ होगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कोशिश इनमें साथ रहने की है। ताकि मजबूत एनडीए का संदेश दिया जा सके। माना जा रहा है कि केन्द्र मंत्री राम विलास पासवान के पार्थिव शरीर के पंच तत्व में विलीन हो जाने के बाद राजनीति की गाड़ी आगे बढ़ेगी। लेकिन इसमें भी चिराग और भाजपा के लिए राजनीति की संभावना अधिक और नीतीश कुमार के लिए कम रह सकती है।
यह कैसा राजनीति का खेल है?
राजनीति का खेल, जहां संभावनाओं का कोई अंत नहीं होता। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीति के इतने ढीठ और गूढ़ खिलाड़ी हैं कि जब आगे बढ़े तो बढ़ते चले गए। अपने साढ़े चार दशक के सक्रिय राजनीतिक जीवन में शायद ही इतना कठिन दौर इससे पहले आया हो। ऐसा पहली बार हुआ है, जब नीतीश कुमार अपने ही बिछाए जाल में उलझते जा रहे हैं। भाजपा बिहार के अपने इस बड़े भाई पर कान तो दे रही है, लेकिन ध्यान नहीं दे रही है।
कभी लालू यादव की आंख के तारे नीतीश कुमार को उन्हें छोड़ने में बहुत देर नहीं लगी थी। समता पार्टी के नेता जार्ज फर्नांडीज को राजी कर राजनीतिक गुरु शरद यादव की पार्टी में विलय कराने का निर्णय भी चुटुिकयों में कर लिया था। राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि अपने उद्देश्य में आड़े आ रहे नीतीश ने न केवल भाजपा से 2013 में नाता तोड़ा, बल्कि 2010 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बिहार विधानसधान सभा चुनाव प्रचार में आने ही नहीं दिया।
2015 में शरद यादव को आधार बनाकर लालू प्रसाद यादव के गले मिले, चुनाव लड़े, जीते, मुख्यमंत्री बने। इसके बाद शरद यादव और लालू यादव को छोड़कर भाजपा के साथ जुड़कर बिहार में सरकार बनाने से गुरेज नहीं किया।