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सीएम की उम्मीदवारी पर बिहार में घमासान, एनडीए की बेचैनी

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बिहार में नेता के नाम और सीटों के बंटवारे को लेकर हो रही देरी से एनडीए के घटक दलों में खासी बेचैनी है। भाजपा के सहयोगी दल चाहते हैं कि जितनी जल्दी हो सके इन दोनों मुद्दों पर फैसला हो जाए, क्योंकि विरोधी जद(यू)-राजद-कांग्रेस गठबंधन नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के बाद जमीनी लड़ाई में आगे निकलता दिख रहा है।
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भाजपा में नेता के मुद्दे पर जारी उहापोह और खींचतान को देखते हुए दोनों सहयोगी दलों रालोसपा और लोजपा ने अपना दबाव बढ़ा दिया है।

इनके फार्मूले के मुताबिक भाजपा को उतनी ही 102 सीटों पर चुनाव लडऩा चाहिए जितनी सीटों पर उसने 2010 में जद(यू) के गठबंधन में रहते हुए लड़ा था।

देरी से नुकसान की आशंका

केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिलकर बिहार को लेकर जल्दी फैसला करने का आग्रह किया है। कुशवाहा ने कहा कि जितनी देरी होगी उतना ही नुकसान होने की आशंका है।

मुख्यमंत्री पद केलिए भाजपा में केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार और बिहार भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी के विरोधाभासी बयानों पर उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि अगर एनडीए तय करता है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज को ही आधार बनाकर चुनाव लड़ेगा तो कोई विवाद ही नहीं है क्योंकि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री भी हैं और एनडीए के सर्वमान्य नेता भी हैं। लेकिन अगर बिहार के किसी चेहरे को आगे करना है तो यह फैसला एनडीए मिलकर करे।

रालोसपा के प्रधान महासचिव शिवराज सिंह के मुताबिक लोकसभा चुनाव के दौरान रालोसपा जब एनडीए में शामिल हुई थी तब यह सहमति बनी थी कि लोकसभा सीटों के मुताबिक विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा नहीं होगा। क्योंकि तब हम नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे,इसलिए भाजपा को ज्यादा लोकसभा सीटें लडऩे के लिए दी गई थीं।
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ये है सीटों का गणित

गौरतलब है कि रालोसपा ने एक प्रस्ताव पारित करके न सिर्फ अपने लिए 67 सीटों और लोजपा के लिए 74 सीटें देने की बात कही है बल्कि अपने नेता उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए की तरफ से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की मांग भी की है।

रालोसपा का तर्क है कि 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा जिन 102 सीटों पर चुनाव लड़ी थी इस बार भी उन्हीं सीटों पर लड़े। शेष 141 सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ दी जाएं। इनमें रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी जो पिछली बार राजद के साथ गठबंधन करके 74 सीटों पर लड़ी थी, वो उसे दे दी जाएं और शेष 67 सीटें रालोसपा केलिए छोड़ दे दी जाएं।

रालोसपा ने इस सीट बंटवारे में जीतनराम मांझी और पप्पू यादव की हिस्सेदारी को शामिल नहीं किया है, जबकि मांझी एनडीए में शामिल होने की घोषणा कर चुके हैं और पप्पू भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं।

इसे लेकर रालोसपा नेताओं का कहना है कि अगर एनडीए में घटक दलों की संख्या बढ़ती है तो भाजपा, लोजपा और रालोसपा अपने अपने हिस्से के अनुपात में कुछ सीटें अन्य घटकों के लिए छोड़ सकते हैं। इसमें जिसके पास ज्यादा सीटें होंगी वो ज्यादा सीटें छोड़े और जिसके पास कम वो कम छोड़े।
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