कभी बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाने और कक्षा में पढ़ाई को रोचक बनाने के उनके अंदाज पर लोग हंसते थे। किसी ने इसे प्रयोग कहा तो किसी ने पढ़ाने का अलग तरीका। लेकिन राकेश कुमार ने अपने तरीके को बदलने के बजाय उसे और मजबूत किया। करीब डेढ़ दशक तक सरकारी स्कूल में नवाचारी और गतिविधि आधारित शिक्षा के प्रयोग करते रहे और धीरे-धीरे उनका यही अंदाज बच्चों के बीच इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें ‘वायरल गुरुजी’ के नाम से पहचान मिलने लगी। अब इसी शिक्षा साधना ने उन्हें राज्य के मंच तक पहुंचा दिया है। समस्तीपुर के रोसड़ा स्थित प्राथमिक कन्या विद्यालय, लक्ष्मीपुर के विशिष्ट शिक्षक राकेश कुमार को राजकीय शिक्षक पुरस्कार-2026 से सम्मानित किया गया है।
डेढ़ दशक पहले शुरू हुआ बदलाव का सफर
रोसड़ा के प्रभु ठाकुर मोहल्ला निवासी राकेश कुमार ने वर्ष 2010 में प्राथमिक कन्या विद्यालय, लक्ष्मीपुर में शिक्षक के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी। ग्रामीण परिवेश वाले इस विद्यालय में उन्होंने बच्चों को सिर्फ किताबों और पारंपरिक पढ़ाई तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा को गतिविधियों और प्रयोगों से जोड़ने की कोशिश शुरू की। उन्होंने कक्षा में खेल, प्रयोग और अलग-अलग शिक्षण गतिविधियों को शामिल किया, ताकि बच्चे पढ़ाई को बोझ की तरह नहीं बल्कि रुचि के साथ सीखें। खासकर कमजोर विद्यार्थियों की बुनियादी समझ मजबूत करने के लिए उन्होंने अपने स्तर पर शिक्षण सामग्री भी तैयार की। शुरुआत में उनके प्रयोगों को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं, लेकिन राकेश कुमार अपने तरीके पर कायम रहे। धीरे-धीरे इन प्रयासों का असर विद्यालय के माहौल में दिखाई देने लगा।
बच्चों की उपस्थिति और भागीदारी में आया बदलाव
गतिविधि आधारित पढ़ाई का असर बच्चों की सीखने की प्रक्रिया पर दिखाई देने लगा। बच्चों की स्कूल में उपस्थिति बढ़ी और कक्षा में उनकी भागीदारी भी बेहतर हुई। पढ़ाई को लेकर बच्चों में सहज रुचि पैदा होने लगी। बच्चों को पढ़ाने के इसी अलग और रोचक अंदाज ने राकेश कुमार को इलाके में एक अलग पहचान दिलाई। सोशल मीडिया और बच्चों के बीच लोकप्रिय होने के बाद वह ‘वायरल गुरुजी’ के नाम से चर्चित हो गए। जिस तरीके को कभी लोग हंसी का विषय मानते थे, वही तरीका अब उनकी पहचान और सम्मान का कारण बन चुका है।
किताबों से आगे बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर जोर
राकेश कुमार के लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं रहा। उनका मानना है कि बच्चों की शिक्षा उनके मानसिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ व्यक्तित्व निर्माण से भी जुड़ी होनी चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ दूसरी गतिविधियों में हिस्सा लेने के अवसर दिए। उनका प्रयास रहा कि बच्चे अपनी प्रतिभा को पहचानें और उसे सामने लाने का आत्मविश्वास विकसित करें। राकेश कुमार कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों के बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। जरूरत सिर्फ उन्हें सही अवसर, दिशा और प्रोत्साहन देने की है। अगर बच्चों को अपनी क्षमता दिखाने का मंच मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं।
‘सरकारी स्कूल बच्चे के सपनों की पहली पाठशाला’
राजकीय शिक्षक पुरस्कार मिलने के बाद राकेश कुमार ने कहा कि सरकारी विद्यालय समाज के अंतिम पायदान पर खड़े बच्चे के सपनों की पहली पाठशाला है। शिक्षक की जिम्मेदारी केवल बच्चों को अक्षर ज्ञान देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब कोई बच्चा स्कूल की चौखट पर पहुंचता है तो उसके भीतर आत्मविश्वास और संवेदनशीलता विकसित करना भी शिक्षक का दायित्व है। बच्चों को सिर्फ परीक्षा के लिए तैयार करने के बजाय उन्हें जीवन के लिए तैयार करना जरूरी है।
राकेश कुमार ने अपने सम्मान का श्रेय खुद को देने के बजाय विद्यार्थियों, सहकर्मियों और ग्रामीण समुदाय के सहयोग को दिया। उनका कहना है कि यह सम्मान उनके अकेले के प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के सहयोग का नतीजा है, जिन्होंने उनके प्रयोगों और प्रयासों पर भरोसा किया।
सम्मान के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ी
राजकीय शिक्षक पुरस्कार मिलने के बाद राकेश कुमार का कहना है कि इस सम्मान ने उनकी जिम्मेदारी को और बढ़ा दिया है। अब उनका प्रयास विद्यालय के शैक्षणिक माहौल को और रोचक, आधुनिक और संस्कारयुक्त बनाने का है। उन्होंने कहा कि आगे भी बच्चों की प्रतिभा को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ने के लिए मंच उपलब्ध कराने का काम जारी रहेगा। उनका मानना है कि अगर शिक्षक ईमानदारी और निरंतरता के साथ प्रयास करें तो सीमित संसाधनों के बावजूद सरकारी शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
सरकारी स्कूलों में नवाचार की मिसाल
राकेश कुमार की कहानी सिर्फ एक शिक्षक के सम्मान तक सीमित नहीं है। यह इस बात का उदाहरण भी है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के पारंपरिक तरीकों के साथ नए प्रयोग किए जाएं तो बच्चों का जुड़ाव शिक्षा से बढ़ाया जा सकता है। ग्रामीण परिवेश के स्कूल में सीमित संसाधनों के बीच गतिविधि आधारित और रोचक शिक्षा को बढ़ावा देना उनकी शिक्षा यात्रा का अहम हिस्सा रहा है। यही लगातार किए गए प्रयोग आज उन्हें राज्यस्तरीय पहचान दिला रहे हैं।
जिले के शिक्षा जगत में खुशी
राकेश कुमार को राजकीय शिक्षक पुरस्कार मिलने से रोसड़ा सहित पूरे समस्तीपुर जिले के शिक्षा जगत में खुशी का माहौल है। साथी शिक्षकों का कहना है कि सीमित संसाधनों वाले सरकारी विद्यालय में लंबे समय तक नए प्रयोग करते हुए बच्चों को पढ़ाई से जोड़ना बड़ी उपलब्धि है। उनकी इस उपलब्धि पर समस्तीपुर की सांसद शांभवी चौधरी, विधायक वीरेंद्र कुमार, नगर परिषद की मुख्य पार्षद मीरा सिंह, पूर्व सभापति सत्येंद्र कुमार नायक, सांसद प्रतिनिधि अनीश राज समेत कई जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें बधाई दी है।
कभी हंसी का कारण बना तरीका, आज सम्मान की वजह
राकेश कुमार की डेढ़ दशक की शिक्षा यात्रा एक खास संदेश देती है। कक्षा में बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाने का तरीका जब उन्होंने शुरू किया, तब वह कई लोगों को सामान्य पारंपरिक शिक्षा पद्धति से अलग और अजीब लगा। लेकिन उन्होंने अपने प्रयोगों को जारी रखा। समय के साथ बच्चों की रुचि, भागीदारी और सीखने के तरीके में बदलाव आया। उनका यही नवाचारी अंदाज उन्हें ‘वायरल गुरुजी’ की पहचान तक ले गया और अब राजकीय शिक्षक पुरस्कार-2026 ने उनकी मेहनत को राज्यस्तरीय सम्मान दे दिया है।