बिहार की सियासत की फिजा एक बार फिर करवट ले रही है और इस बार इसका केंद्र बना है मिथिला की धरती, दरभंगा। यहां राजनीति सिर्फ दीवारों पर लगे पोस्टरों या मंचों की गूंज तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों की सांसों में घुली हुई है। अमर उजाला का चुनावी रथ ‘सत्ता का संग्राम’ आज दरभंगा की गलियों में पहुंचा, जहां खेतों की हरियाली के साथ चुनावी चर्चाओं की फसल भी लहलहा रही है। चौक-चौराहों पर चाय की दुकानों में राजनीति का स्वाद उबल रहा है, और हर नुक्कड़ पर बस एक ही सवाल तैर रहा है, “इस बार जनता किसे चुनेगी?” सुबह की चाय से लेकर दोपहर की बहसों तक, हर आवाज़ में उम्मीदों और आकांक्षाओं की गूंज है। आइए, जुड़िए ‘सत्ता के संग्राम’ के साथ और सुनिए दरभंगा की जनता किस पर भरोसा कर रही है, किससे नाराज है और आखिर किसे सौंपना चाहती है सत्ता की बागडोर।
स्थानीय निवासी केशव ने कहा, “इस बार वोट देने का आधार शिक्षा, भ्रष्टाचार और रोजगार रहेगा। हर पार्टी वादे तो बहुत करती है, लेकिन निभाती कोई नहीं। युवाओं के लिए रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है। पहले नीतीश कुमार ने डोमिसाइल नीति खत्म कर दी थी, फिर एनडीए में आने के बाद दोबारा लागू कर दी। मुख्यमंत्री को समझना होगा कि इस बार फैसला बिहार का युवा करेगा। इसलिए मैं इस बार नोटा दबाऊंगा।”
वहीं ऋषभ ने कहा, “यहां रोजगार ही सबसे बड़ा मुद्दा है। मुख्यमंत्री को समझना चाहिए कि डोमिसाइल नीति जरूरी है। अगर वे दूसरे राज्यों के लोगों को नौकरी देंगे, तो बिहार के युवाओं का क्या होगा? यहां के विधायक और सांसद ने भी कोई काम नहीं किया है।”
अभिनव ने कहा, “बिहार में बहुमत वाली मजबूत सरकार बननी चाहिए। एक स्थिर सरकार का होना बहुत जरूरी है। इस बार यह थोड़ा मुश्किल लग रहा है, लेकिन आने वाले समय में यह जरूरी होगा। सरकार कोशिश कर रही है कि युवाओं को सरकारी नौकरी मिले, लेकिन सबको सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है। इसलिए प्राइवेट सेक्टर में नौकरियों को बढ़ावा देना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को इस दिशा में गंभीरता से काम करना चाहिए।”
हिमांशु ने कहा, “दरभंगा में इस बार फिर से बीजेपी की जीत तय लग रही है। यहां के माहौल में साफ तौर पर बीजेपी की हवा चल रही है।” दिवाकर ने कहा, “नीतीश कुमार ने जमीन पर बहुत काम किया है। आरजेडी की सरकार में चीनी मिलें बंद हो गई थीं, अब सरकार को इन मिलों को फिर से शुरू करने पर ध्यान देना चाहिए।”