निगरानी न्यायालय, पटना के न्यायाधीश मो. रुस्तम ने सोमवार को भ्रष्टाचार के एक मामले में जिला शिक्षा कार्यालय, नालंदा के लिपिक राज किशोर सिन्हा को दोषी करार देते हुए उन्हें तीन साल की सश्रम कारावास और ₹20,000 जुर्माने की सजा सुनाई है। यह मामला वर्ष 2009 में निगरानी थाना कांड संख्या 44/2009 के तहत दर्ज हुआ था। आरोप था कि लिपिक राज किशोर सिन्हा ने शिकायतकर्ता अवधेश कुमार से वेतन भुगतान के बदले ₹1600 की रिश्वत की मांग की थी। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने उन्हें 28 अप्रैल 2009 को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था।
मामले की सुनवाई विशेष वाद संख्या 34/2009 के तहत हुई, जिसमें आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7 में एक वर्ष सश्रम कारावास एवं ₹10,000 का जुर्माना और धारा 13(2) सह पठित धारा 13(1)(डी) में दो वर्ष सश्रम कारावास एवं ₹10,000 का जुर्माना लगाया गया है। जुर्माने की राशि अदा न करने की स्थिति में अतिरिक्त एक माह का साधारण कारावास भुगतना होगा। दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
मामले की सफल अभियोजन के लिए तत्कालीन अनुसंधानकर्ता पुलिस निरीक्षक शशि शेखर झा द्वारा समय पर सटीक आरोप पत्र दाखिल किया गया और विशेष लोक अभियोजक (निगरानी ट्रैप) किशोर कुमार सिंह ने प्रभावी ढंग से पैरवी की। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की सक्रियता से वर्ष 2025 में अब तक 12 ट्रैप मामलों में दोष सिद्ध कर सजा सुनाई जा चुकी है, जबकि वर्ष 2024 में कुल 18 मामलों में सजाएं दी गई थीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई में इस वर्ष और अधिक तीव्रता आई है।
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अन्य मामलों में दोषी पाए गए अधिकारी
निगरानी ब्यूरो द्वारा जिन अन्य मामलों में सजा दिलवाई गई है, उनमें विभिन्न विभागों के अधिकारी शामिल हैं:
रामकृष्ण मिश्र, अमीन, चकबंदी कार्यालय, डेहरी – ₹2000 रिश्वत
राजा राम सिंह, उजरत अमीन, राजगीर – ₹5 लाख रिश्वत
राजनंदन कुमार श्यामला, प्रशाखा पदाधिकारी, कृषि विभाग – ₹60,000 रिश्वत
संजय कुमार, गृह विभाग – ₹7,000 रिश्वत
सविता कुमारी, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी – ₹30,000 रिश्वत
अनुप कुमार त्रिवेदी, कोषागार, पटना – ₹3,000 रिश्वत
अजित कुमार राय, पु.अ.नि., नोबतपुर – ₹10,000 रिश्वत
परशुराम सिंह, पु.अ.नि., भभुआ – ₹4,000 रिश्वत