बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन के मुख्य घटक राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने पटना हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद भी दुहराया था कि जातिगत जनगणना होकर रहेगी। लेकिन, क्या यह इतना आसान है? अगर पटना हाईकोर्ट की ओर से 04 मई को दिए अंतरिम फैसले के 11 अहम बिंदुओं को समझें तो नामुमकिन भी लगता है, लेकिन 03 जुलाई से HC में हो रही सुनवाई के दौरान जिरह और फिर कोर्ट के अंतिम फैसले में पता चलेगा कि होता क्या है।
अंतरिम फैसले के इन 11 बिंदुओं को समझें
पटना हाईकोर्ट के अंतरिम फैसले में 11 बिंदुओं पर सरकार फंसी नजर आती है। यह याचिककर्ताओं या उनके अधिवक्ताओं के बिंदु नहीं थे, बल्कि हाईकोर्ट का इस केस पर अंतरिम नजरिया है। अंतरिम आदेश के पैराग्राफ 21 से 31 तक में कोर्ट ने क्या लिखा, उसे हिंदी में समझने से पहले आदेश की इन 10 लाइनों को साफ-साफ देखना भी चाहिए।
यह लाइनें कोर्ट के अंतरिम आदेश से शब्दश: ली गई हैं-
1. “Census is included in List I of the Seventh Schedule of the Constitution of India at Entry 69. The power to carry out a census being in the exclusive domain of the Union Parliament, the State Legislature cannot embark upon such an exercise.”
2. “We find that the caste based survey is a census in the garb of a survey.”
3. “We are of the opinion that the state has no power to carry out a caste based survey in the manner in which it is fashioned now which would amount to a census.”
4. “We are convinced that the survey in the manner in which it is carried out cannot be set to be within the policy realm of the state.”
5. “We also see from the notification issued that the government intense to share data with the leaders of different parties of the state assembly the ruling party and opposition party which is also a matter of great concern.”
6. “This is explicit from the requirement in the guidelines to a certain the cast of an individual from the head of the family relative or neighbour.”
7. “The guidelines also prohibits the cast of the mother to be entered as that of the child which is in violation of the hon’ble supreme court declaration that the backwardness of a person.”
8. “To effectuate affirmative action and identify backwardness a commission has already been appointed.”
9. “It has also to be pertinently observed that survey through extends to the age gender marital status income for this position and educational qualification of each individual the intention was solid to identify the cast which is more than evidence from the technology with which the survey has been called a cast based survey.”
10. “This also stands against the contention taken of a voluntary disclosure.”
पैराग्राफ 21/22 में संवैधानिकता को लेकर राय
"भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के लिस्ट-1 की 69 वीं इंट्री census है। इसमें स्पष्ट है कि इससे संबंधित कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संसद को है। राज्य को लिस्ट-2 पर नियम या कानून बनाने का अधिकार है। जनगणना कराने का अधिकार भारतीय संसद में निहित है।”
पैराग्राफ 23 में पूरी प्रक्रिया और नाम पर राय
“बिहार सरकार ने जाति आधारित सर्वे कराने का फैसला लिए जाने की जानकारी दी और बताया है कि सामान्य प्रशासन विभाग राज्य की आकस्मिकता निधि से इस काम को पूरा कराएगा। प्रधान सचिव की ओर से जिले के अधिकारियों को भेजे संदेश में लिखा गया है- 'जाति सूची 2022 के निर्धारण के लिए बिहार में जाति आधारित गणना'। इसमें 17 तरह की जानकारी लेने वाला प्रारूप रखा गया, जिसमें 'जाति' भी एक है। परिवार के सदस्य की जाति और आमदनी की जानकारी परिवार के मुखिया से लेनी है, न कि व्यक्ति विशेष से। यह अपने आप में इस डाटा की सच्चाई को संदेहास्पद बना देता है। यानी, व्यक्ति की स्वैच्छिक जानकारी प्राप्त नहीं हो रही है। बिहार में नहीं रहे राज्य के लोगों का डाटा फोन से बात कर और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा सत्यापन कराने की बात कही गई है। परिवार के मुखिया से प्राप्त डाटा को इस तरह सत्यापित नहीं किया जा सकता और वीडियो कॉन्फ्रेंस पर उपस्थित व्यक्ति का सत्यापन भी अनिवार्य है। अगर यह डाटा सुरक्षित नहीं रह सका तो भविष्य में यह उस व्यक्ति के खिलाफ साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल हो सकता है। इस सर्वे में उम्र, लिंग, वैवाहिक स्थिति, आय, शैक्षणिक योग्यता की भी जानकारी ली जा रही, जिसका मुख्य उद्देश्य हर व्यक्ति की जाति की पहचान करना है। यह उद्देश्य दिए गए नाम 'जाति आधारित सर्वे’ से भी और ज्यादा स्पष्ट हो जा रहा है।”
पैरा 24/25/26 उद्देश्य के साथ बता रहा अवमानना
“सरकार जब कोर्ट को बता रही कि पब्लिक डोमेन में सारा डाटा पहले से ही उपलब्ध है। लोगों ने नौकरी या समाज कल्याण की योजनाओं को पाने के लिए यह जानकारी पब्लिक डोमेन में दे रखी है तो फिर जनता का इतना का इतना पैसा इस काम में खर्च क्यों किया जा रहा? जहां तक पिछड़ेपन को जांचने का सवाल है तो इसके लिए आयोग है ही, वह इस पर विचार करता। परिवार के मुखिया, रिश्तेदार या पड़ोसी से जाति की जानकारी ली जा रही है। मतलब यह प्रक्रिया पिछड़ेपन को चिह्नित करने के लिए नहीं, बल्कि बिहार में रहने वाले लोगों की जाति का पता लगाने के लिए की जा रही है। गाइडलाइन है कि बच्चे की जाति निर्धारण के लिए मां से पिता की जाति पूछी जाए। यह भी अनिवार्य किया गया है कि मां किसी अन्य के सामने बच्चे के पिता की यह जानकारी जाहिर करे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना कर इस सर्वे में निर्देश है कि मां की जाति को संतान की जाति नहीं लिखा जाए। सुप्रीम कोर्ट यह भी स्पष्ट कर चुका है कि बच्चे का लालन-पालन जिन परिस्थितियों में हुआ है, उसके आधार पर उसकी जाति का निर्धारण हो सकता है।”
पैरा 27/28 में इसकी इच्छाशक्ति पर सवाल
"विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से सर्वे कराने के संकल्प के बाद अगर कैबिनेट से भी सहमति हो चुकी थी तो यह समझ से बाहर है कि कानून बनाने में सक्षम विधानमंडल ने ऐसा क्यों नहीं किया? यह विलंब से लाया गया वाद नहीं, क्योंकि यह जनता के हित से जुड़ी याचिका है। हम इस बात से संतुष्ट हैं कि जिस तरह से सर्वेक्षण किया जा रहा है, वह राज्य के लिए निर्धारित नीति के तहत नहीं है।”
29/30/31 में स्पष्ट- अनधिकृत जानकारी जुटाकर बांटेंगे, यह गलत है
"यह जाति आधारित सर्वे के नाम पर की जा रही 'जनगणना' है, जिसका अधिकार जनगणना कानून 1948 के तहत भारतीय संसद में समाहित है। जनगणना कानून के तहत जानकारी लेने के दरम्यान भी सूचनाएं ली जाती हैं, लेकिन वह सूचनाएं सुरक्षित रहती हैं और न तो उन्हें कोई देख सकता है, न ही साक्ष्य के रूप में वह सूचनाएं स्वीकार्य हैं। बिहार के दोनों सदनों ने इसे पास किया, लेकिन इसके लिए हुए विमर्श और इसके उद्देश्यों की जानकारी रिकॉर्ड में नहीं है। इसका 80 फीसदी कार्य पूरा भी हो गया है। डाटा की सत्यता और सुरक्षा के लिए भी सरकार को पूरी प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए। अत: प्रथम दृष्टया कोर्ट का मानना है कि जिस तरह जनगणना के रूप में जाति आधारित सर्वे किया जा रहा है, वह राज्य के अधिकार में नहीं बल्कि भारतीय संसद के अधिकार क्षेत्र में है। इसके अलावा, यह भी अधिसूचना से यह भी पता चलता है कि सरकार इस डाटा को राज्य विधानसभा, सत्तारूढ़ व विपक्षी दलों के बीच शेयर करेगी, जो चिंता का विषय है। यह निजता के अधिकार पर निश्चित रूप से बड़ा सवाल है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जीवन का अधिकार माना है। इन परिस्थितियों में राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह याचिका पर अंतिम फैसले तक जाति आधारित इस सर्वे को तत्काल प्रभाव से बंद करे, अब तक एकत्रित डाटा को सुरक्षित रखे और किसी से शेयर नहीं करे।”