नीतीश कुमार-जीतन राम मांझी (फाइल फोटो)
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फिर क्या होता गया, जो यह नौबत आ गई
ऐसा नहीं कि जीतन राम मांझी ने 13 अप्रैल से पहले महागठबंधन की चट्टानी एकता पर दोतरफा बात नहीं की थी। उन्होंने कभी महागठबंधन की चट्टानी एकता की बात की तो अपने बेटे संतोष सुमन को उप मुख्यमंत्री के काबिल बताने से भी नहीं चूके। लेकिन, 13 अप्रैल के बाद परिस्थितियां कई बार बदलीं। ऐसी बदलीं कि कोर कमिटी की इस महीने हुई बैठक के दौरान हिन्दुस्तान आवामी मोर्चा ने तय कर लिया कि महागठबंधन में बने रहने या नहीं रहने को लेकर फैसला जीतन राम मांझी और उनके मंत्री बेटे संतोष सुमन ले लें। 8-9 जून को जीतनराम मांझी ने स्वीकार किया कि वह लोकसभा की 40 सीटों में से पांच पर अपना प्रत्याशी देना चाहते हैं, लेकिन मीडिया के सामने यह नहीं माना कि उन्होंने ऐसा नहीं होने पर महागठबंधन छोड़ने का फैसला लेने की तैयारी की है। तैयारी तो थी। सिर्फ पांच सीटों का ही मसला नहीं था। 13 अप्रैल को शाह से मुलाकात के बाद एनडीए से नजदीकियां बढ़ीं और महागठबंधन में विशेष तौर पर राजद से तल्खी बढ़ी। 12 अप्रैल को जीतन राम मांझी ने यह स्वीकार कर लिया कि उनकी पार्टी को विपक्षी दलों की बैठक का बुलावा अबतक नहीं मिला है। और फिर, 13 जून को जब संतोष सुमन उर्फ संतोष मांझी ने बिहार की नीतीश सरकार के अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।