दरभंगा एम्स को लेकर महागठबंधन भी करेगा राजनीति
- फोटो : अमर उजाला
2015-16 में केंद्रीय वित्त मंत्री ने की थी घोषणा
पटना में बिहार का पहला एम्स ठीक से चालू भी नहीं हो सका था, तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2015-16 के बजट में बिहार को दूसरा एम्स देने की घोषणा की थी। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली दुनिया से विदा हो गए और पटना में 2019 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी प्रतिमा का भी अनावरण कर दिया, लेकिन बिहार में एम्स बनना शुरू नहीं हुआ। यहां तक कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसकी जगह पर भी मुहर नहीं लगाई।
साथ हुए तो बात बढ़ी, दूर गए तो तकरार
जब बिहार में एम्स की बात आगे बढ़ी तो एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वापस एनडीए में आ चुके थे। बिहार में डबल इंजन सरकार चल रही थी। मुख्यमंत्री ने दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (DMCH) को ही अपग्रेड करने की बात की तो भी बात आगे बढ़ी। फिर डीएमसीएच के पास ही एम्स बनाने पर सहमति बनी तो जमीन हस्तांतरण की बात भी बढ़ गई। देखने वाली बात है कि जब घोषणा हुई थी, तब नीतीश कुमार महागठबंधन के मुख्यमंत्री थे। जब एनडीए के मुख्यमंत्री बने तो बात आगे बढ़ी। इतनी आगे कि सितंबर 2020 में केंद्रीय कैबिनेट ने दरभंगा के नाम पर स्वीकृति दे दी। लेकिन, फिर नीतीश कुमार महागठबंधन के मुख्यमंत्री बन गए तो विचारों में टकराव भी दिखने लगा। नतीजा यह रहा कि पहले डीएमसीएच के पास अपेक्षित जमीन उपलब्ध नहीं करा पाने के आधार पर बिहार की महागठबंधन सरकार ने जगह ही बदल दी। नई जगह चुनने में राष्ट्रीय जनता दल का प्रभाव था, हालांकि जदयू कोटे के मंत्री संजय झा इसके लिए लगातार सक्रिय दिखे। लेकिन, तकरार है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही।
स्थानीय लोग समाधान चाह रहे हैं, राजनीति नहीं
- फोटो : अमर उजाला
309 करोड़ में गड्ढा भरेंगे- सवाल तो उचित है
3,09,00,00,000 रुपये कम नहीं होते हैं, जो राज्य कैबिनेट ने दरभंगा एम्स के लिए नई जमीन के समतलीकरण का बजट पास किया है। इस राशि से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि गड्ढे को जमीन के रूप में बदलने में कितना खर्च आएगा। गड्ढे का सवाल इसलिए है, क्योंकि जब डीएमसीएच के पास एम्स बनाने की बात आई थी तो भी औसतन तीन फीट गहरे 81 एकड़ के प्लॉट को 14 करोड़ खर्च कर समतल बनाने में चार साल लगे। 121 एकड़ की जगह पूरी नहीं दे पाने का कारण बीच से समस्तीपुर-दरभंगा रेलवे लाइन का गुजरना था। जमीन पूरी नहीं होने के आधार पर जब साइट बदलने की बात आई तो शोभन बाइपास पर एम्स बनाने में महागठबंधन सरकार ने तेजी दिखाई। 27 अप्रैल 2023 को केंद्रीय टीम के निरीक्षण से पहले ही इस जमीन पर मिट्टी भराई का टेंडर भी हो गया और 18 अप्रैल को दरभंगा में प्रस्तावित एम्स की इस जमीन के समतलीकरण के लिए 309 करोड़ 29 लाख 59 हजार रुपये खर्च करने की स्वीकृति भी मिल गई।
भाजपा ने मिथिलांचल के लोगों की बद्दुआ लगेगी, तक कह दिया
- फोटो : अमर उजाला
आशंकाओं के कारण ही टेंडर पर भी जमीनी काम नहीं
दरभंगा में एम्स बनाने पर महागठबंधन सरकार अटल थी, लेकिन बिहार में ही दूसरा एम्स सहरसा में बनाने की मुहिम भी चल रही थी। इस हल्ले के कारण कई तरह की आशंका थी, जिसका असर शोभन की प्रस्तावित जमीन पर भी दिखता है। जमीन पर अप्रैल से जून तक मिट्टी भराई का काम नहीं दिख रहा है। बारिश आने वाली है और इसमें मिट्टी भराई का काम संभव भी नहीं होगा क्योंकि यह वैसे भी निचली जमीन है। मतलब, अभी काम पर विराम ही रहेगा। इस बीच केंद्र सरकार की चिट्ठी ने साफ किया है कि 27 अप्रैल को केंद्रीय टीम ने निरीक्षण में पाया गया कि शोभन बाइपास पर एम्स के लिए प्रस्तावित की गई जमीन पांच आधारों पर सही नहीं है, इसलिए राज्य सरकार दूसरी जगह देखे। यहां यह सवाल मायने रखता है कि जब 27 अप्रैल को निरीक्षण किया गया तो चिट्ठी जारी करने में एक महीने का वक्त क्यों लगा? महागठबंधन का आरोप है कि भाजपा ने जानबूझ कर इस जगह को कैंसिल कराया है।
हर बात से रुबरु रहे लोग राजनीति भी समझ रहे हैं
- फोटो : अमर उजाला
मिथिलांचल की राजनीति में एम्स का मुद्दा होगा खास
सारी हकीकत समझने के बाद वजह तलाशेंगे तो समझ में आएगा कि मिथिलांचल के लिए एम्स बड़ा मुद्दा बनने वाला है। भाजपा ने तो इसकी बाकायदा घोषणा भी कर दी है। मुद्दा इसलिए बनेगा कि 2015-16 या उससे पहले घोषित अन्य राज्यों के एम्स ऑपरेशनल भी हो गए, लेकिन दरभंगा में यह अटका हुआ ही है। भाजपा इसके लिए नीतीश सरकार को दोषी बता रही है और महागठबंधन के नेता केंद्र सरकार पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। दोषारोपण के बीच जदयू ने दरभंगा की मेयर को अपने दल में शामिल करा लिया है, जबकि शहरी क्षेत्र का विधानसभा में प्रतिनिधित्व भाजपा कर रही है। 2025 के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा बनेगा या नहीं, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में मिथिलांचल के अंदर एम्स का मुद्दा जरूर गरम रहेगा। दोनों पक्ष सामने वाले को कठघरे में लाना चाहेंगे और राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी ने इसकी शुरुआत दरभंगा में ही कर भी दी है। बाकी नेता भी कमान संभाले हैं। उधर, महागठबंधन की ओर से भी इसे केंद्र सरकार की मनमानी बताकर जनता के बीच अपनी बात रखी जा रही है। महागठबंधन में राजद का भी इस जमीन पर ज्यादा फोकस है, क्योंकि यह उसके प्रभाव वाला इलाका है। बहरहाल, दोनों पक्ष चाहें तो जल्दी से बिना डूब की जमीन ढूंढ़कर समाधान निकालते हुए इस मुद्दे को खत्म किया सकता है। वैसे, ऐसा होगा नहीं।