सुशील मोदी हमेशा नीतीश कुमार के सबसे पसंदीदा डिप्टी रहे।
- फोटो : अमर उजाला डिजिटल
जय प्रकाश नारायण, यानी जेपी के त्रिमूर्ति कहे जाते थे- लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी। लालू घाेटालों में फंसकर सक्रिय राजनीति से दूर हुए। नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। और, सुशील कुमार मोदी दोनों के साथ भी रहे और दोनों से दूर भी। अब दोनों से स्थायी तौर पर दूर हो गए सुशील कुमार मोदी। तीनों का करीब पांच दशकों का साथ था। भारतीय जनता पार्टी से कभी लालू प्रसाद यादव भी करीब हुए थे तो उसमें सुशील कुमार मोदी की भूमिका मानी जाती थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तो भाजपा से हर बार करीब आने की वजह ही सुशील मोदी रहे। खास बात यह भी कि लालू से लंबे समय से दूरी में सुशील मोदी हमलावर भूमिका में अग्रणी रहे। इसी तरह जब भाजपा नीतीश कुमार से अलग रही तो उनपर हमले की कमान भी सुशील मोदी ही संभालते रहे। मतलब, पांच दशकों में जब-जो रिश्ता मिला, उसे बखूबी निभाया सुशील मोदी ने। आज उनके निधन से यूं तो राजनीति में हर कोई आहत है, लेकिन इन दोनों पर इसका असर ज्यादा होगा। उसमें भी नीतीश पर सर्वाधिक। क्योंकि, वह हमेशा नीतीश के सबसे पसंदीदा डिप्टी रहे।
कमान संभाली तो सरकार बदलने को मजबूर हुए नीतीश
लालू-नीतीश-सुशील की त्रिमूर्ति के रिश्तों को ठीक से समझना हो तो भी बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं। 2005 से नीतीश कुमार के साथ ही सुशील मोदी साये की तरह थे। जब प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को भाजपा ने आगे किया था, तब नीतीश कुमार ने भाजपा से दूरी बना ली। येन-केन-प्रकारेण यह दूरी बनी तो 2014 के लोकसभा के बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी कायम रही। भाजपा को इस चुनाव में भारी झटका लगा। कोई तारणहार नहीं नजर आ रहा था। नीतीश कुमार वापस लालू प्रसाद यादव के साथ हो लिए थे। पहली बार तेजस्वी यादव को डिप्टी सीएम की कुर्सी मिली थी। सब ठीक ही चल रहा था। लेकिन, फिर सुशील कुमार मोदी ने मिट्टी-मॉल घोटाले की फाइल ऐसी खोली कि नीतीश कुमार को अपने फैसले पर शक होने लगा। लगभग 50 दिनों तक सुशील मोदी ने ऐसा अभियान चलाया कि नीतीश कुमार का शक यकीन में बदल गया और 2015 में लिए महागठबंधन के लिए जनादेश को ठुकरा कर वह 2017 में वापस भाजपा के साथ आ गए।
सुशील भेजे गए दिल्ली तो नीतीश भी हो गए भाजपा से दूर
फिर सब ठीक चल रहा था और 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ नीतीश कुमार को जनादेश मिला। इस जनादेश के बाद भाजपा ने अप्रत्याशित रूप से नीतीश कुमार को झटका दिया। भाजपा ने सुशील कुमार मोदी को उनका डिप्टी सीएम नहीं बनाया। उन्हें राज्यसभा भेज दिया। तभी से यह माना जा रहा था कि समन्वय का संकट होगा। यही हुआ भी, जिसके कारण नीतीश कुमार ने एक बार फिर लालू प्रसाद यादव का रुख किया। वह भाजपा के साथ पुराने प्रारूप का संबंध कायम नहीं रख सके। महागठबंधन की सरकार बीच में ही बनी और फिर जब लोकसभा चुनाव की आहट शुरू हुई तो अपने जन्मदिन के आसपास सुशील कुमार मोदी ने नीतीश को वापस लाने का प्रयास अपने स्तर से शुरू किया। जनवरी 2024 में सुशील कुमार मोदी के जन्मदिन (5 जनवरी) के पोस्टरों में उन्हें 'बिहार भाजपा का संकटमोचक' बताया गया और 28 जनवरी को नीतीश कुमार फिर भाजपा के साथ आ गए। बस, सुशील कुमार मोदी की वापसी नहीं हुई। और, अब तो वह वहां चले गए- जहां से कोई वापस ही नहीं आता।