ये आंकड़ा इसलिए इतना दिलचस्प है कि राजनैतिक पार्टियां ही अपराध को राजनैतिक मुद्दा बनाती हैं और अपनी पार्टी में आपराधिक छवि वाले विधायकों को टिकट भी देती हैं। वहीं जनता भी ऐसे उम्मीदवारों को वोट देने के लिए आगे आती है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार में साफ छवि के साथ चुनाव जीतने वालों की संभावना पांच फीसदी है।
जबकि आपराधिक मामलों के साथ उम्मीदवारों की छवि जीतने वालों की संभावना 15 फीसदी है। एडीआर और इलेक्शन वॉच ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सांसदों, विधायकों और उम्मीदवारों के वित्तीय और आपराधिक मामलों का विश्लेषण यह रिपोर्ट जारी की है।
महिला उम्मीदवारों पर भी गंभीर केस - रिपोर्ट
रिपोर्ट में 2005, 2010 और 2015 के विधानसभा और 2009, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों और उपचुनावों को शामिल किया गया है। इन चुनावों के दौरान उम्मीदवारों की ओर से जमा किए शपथ पत्र का विश्लेषण को रिपोर्ट में शामिल किया गया है।
2005 में चुनाव लड़ने वाली 779 में से 151 (19 फीसदी) महिला उम्मीदवारों ने अपने ऊपर गंभीर आपराधिक मामले और 94 महिला उम्मीदवारों ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं। वहीं उसी साल पुरुष उम्मीदवारों की बात करें तो 10,006 में से 3,079 (31 फीसदी) ने अपने ऊपर आपराधिक मामले और 2,110 (21फीसदी) उम्मीदवारों ने गंभीर आपराधिक मामले होने की बात मानी है।
वहीं 2005 में चुनाव जीतने वाली 90 में से 30 यानि कि 33 फीसदी महिला सांसदों, विधायकों ने अपने ऊपर आपराधिक और 18 महिलाओ ने गंभीर आपराधिक मामले होने का एलान किया।