बिहार विधानसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह अभी कोई नहीं बता रहा है, एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार चुनाव की घोषणा से पहले ही वहां चार रैलियां और चार सरकारी कार्यक्रम कर चुके हैं।
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नीतीश-लालू के महागठबंधन ने भी पटना में बड़ी रैली कर चुनावी आकलन में संशोधन की जरूरत जता दी, फिर भी बिहार में किसी से भी बात कीजिए, सबको इंतज़ार है उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की।
इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस चुनाव में कितनी कांटे की टक्कर वाला होने जा रहा है, ऐसे में आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के असदुद्दीन ओवैसी के सिर्फ सीमांचल में चुनाव लड़ने की घोषणा से सियासी हलचल का बढ़ जाना स्वाभाविक ही है।
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सीमांचल बिहार का वह इलाका है जहां से राज्य की 243 में से 24 सीटें आती हैं और मुसलमानों की आबादी 40 फ़ीसदी से भी ज्यादा है। भाजपा इस क्षेत्र में अधिकतर सीटों पर कब्जा करने का दावा कई बार कर चुकी है।
क्या है उनका इरादा
इस क्रम में इस इलाके के करीब सहरसा व भागलपुर में प्रधानमंत्री की रैलियां भी हो चुकी हैं। 2010 के चुनाव में इस इलाके की 24 सीटों में से 13 भाजपा को मिली थीं। जदयू को 4, लोजपा को 2, कांग्रेस को 3, राजद को 1 और एक सीट निर्दलीय को मिली थी।
पहला सवाल यह है कि ओवैसी ने इस क्षेत्र को क्यों चुना? स्वाभाविक रूप से जवाब यह होगा कि चूंकि यहां मुसलमान ज्यादा हैं, और इसलिए ओवैसी के लिए यह इलाका सबसे मुफीद है।
लेकिन कारण क्या सिर्फ इतना है? जरा विधानसभा चुनाव कार्यक्रम पर गौर कीजिए, इस इलाके में मतदान आखिरी चरण यानी 5 नवंबर को होना है। चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से पहले जब ओवैसी किशनगंज आए थे, तब उन्होंने संकेत दिये थे कि उनकी पार्टी बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी लेकिन चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद उनका इरादा बदल गया।
यदि सीमांचल में मतदान पहले चरण में होता, तो भी क्या वह सिर्फ इसी इलाके में चुनाव लड़ते? मेरा मानना है कि नहीं, क्योंकि तब उनका प्रचार पहले ही चरण में खत्म यानी 10 अक्तूबर को ही ख़त्म हो जाता और वह बाकी चरणों में यदि सभाएं करते तो उनकी मंशा पर खुलकर सवाल उठते। लेकिन अब वह कम सीटों पर उम्मीदवार खड़े करके भी पूरे चुनाव के दौरान प्रचार सभाएं कर सकेंगे।
ध्रुवीकरण से किसे होगा फायदा
ओवैसी भले ही 24 सीटों पर लड़ रहे हों लेकिन उनके निशाने पर जो मतदाता हैं, वह महागठबंधन का पक्का वोट माना जा रहा है। इसलिए ओवैसी की पार्टी जितना भी वोट पाएगी, वह महागठबंधन को ही नुकसान पहुंचाएगा।
ओवैसी की प्रचार शैली आक्रामक और ध्रुवीकरण पैदा करने वाली होती है, ध्रुवीकरण दोतरफा होता है और इसका असर बाकी बिहार में भी पड़ना तय है। 2010 का चुनाव एकतरफा चुनाव था लेकिन इस बार कांटे की टक्कर है और ऐसे में कई पर्यवेक्षक मुसलमान वोट के महगठबंधन में जाने को तय मान रहे हैं, और यही महागठबंधन की सबसे बड़ी ताकत है।
ओवैसी कितना मुसलमान वोट काटेंगे, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि बहुसंख्यक समुदाय में उनके बयानों की क्या प्रतिक्रिया होगी। शुरुआत ओवैसी ने अनुच्छेद 371 की बात करके कर दी है।
अनुच्छेद 371 अनुच्छेद 370 की याद तुरंत दिला देता है, यहां यह बताना जरूरी है कि उनके भाई व एमआईएम विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी घृणा फैलाने वाले बयानों के मामले में जेल जा चुके हैं।
महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में ओवैसी फैक्टर अपना रंग दिखा चुका है, कांटे के इन चुनावों में औवैसी की पार्टी ने दो सीटें ही जीतीं, लेकिन नुकसान किसे पहुंचाया, यह हर कोई जानता है।
बिहार में भी दोनों गठबंधनों के बीच बराबर की टक्कर दिखाई दे रही है। ऐसे में, पहले मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी का महागठबंधन से अलग होने व सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा और अब ओवैसी के आख़िरी चरण की सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा, महागठबंधन की चिंता बढ़ाने वाली ही है।
करीब दो माह पहले भाजपा के अंदरूनी सूत्रों ने अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि देखते जाइए, क्या-क्या होता है यहां, बहुत से 'लीवर' हैं जिनका इस्तेमाल किया जाना बाकी है।
हालांकि जदयू व राजद के नेता इस पर खुलकर कुछ बोलने से बच रहे हैं लेकिन उनके बयानों से यह जरूर ध्वनित हो रहा है कि उनका मानना है, यह सब भाजपा करवा रही है।
जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने शनिवार को कहा कि औवैसी के पीछे कौन है, इस पर वे कोई टिप्पणी नहीं करना चाहेंगे लेकिन एक राजद नेता ने कहा कि ओवैसी के तार दिल्ली से जुड़े हैं।