बिहार विधानसभा चुनावों का बिगुल बजने के बाद सभी दलों ने राजनीतिक पेशबंदी तेज कर दी है। सभी दलों के नेता बढ़ चढ़कर अपनी अपनी जीत के दावे भी कर रहे हैं। हालांकि बीते चुनावों के मुकाबले बिहार का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है।
पुराने दोस्त आज दुश्मन बन चुके हैं तो जो कभी दुश्मन हुआ करते थे आज वो चुनावी रण में एक साथ कदमताल करते नजर आ रहे हैं। बिहार के चुनाव इस बार हर लिहाज से रोचक होते नजर आ रहे हैं।
इन चुनावों में जहां भाजपा और उसके कमांडर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है तो भाजपा के सबसे कामयाब अध्यक्ष माने जा रहे अमित शाह का असली इम्तिहान भी इन्हीं चुनावों में होना है।
वहीं लालू और नीतीश कुमार की जोड़ी इस बार बिहार के मतदाताओं के सामने एक अलग ही विकल्प के रूप में सामने है। ऐसे में देखना रोचक होगा कि बिहार का ऊंट किस करवट बैठता है। आइए निगाह डालते हैं बीते चुनावों के कुछ ऐसे परिणामों पर जो आपके लिए काफी रोचक भरे हो सकते हैं।
साल 2010 में ये था दलों का हाल
बीते विधानसभा चुनाव में साल 2010 में भाजपा और जेडीयू मिलकर राजग के बैनर तले 243 सीटों पर चुनाव लड़े थे। जिसमें से जेडीयू के हिस्से में 141 सीटें आईं थी। इनमें से जेडीयू ने 115 सीटों पर जीत दर्ज की।
जबकि भाजपा के हिस्से में 102 सीटें आईं। वहीं एलजेपी के साथ मिलकर लड़े लालू यादव के राजद को 168 में से मात्र 22 सीटों पर संतोष करना पड़ा जबकि 75 सीटों पर लड़ने वाले एलजेपी को मात्र 3 सीटें मिल पाईं।
वहीं इन चुनावों में सबसे बुरी गत कांग्रेस की हुई जो सभी सीटों पर अकेले लड़ी और उसके हिस्से में मात्र 4 सीटें आईं। कभी बिहार में लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस के लिए यह सबसे करारी हार थी।
साल 2005 में बदल गई थी बिहार की सत्ता
बिहार में सबसे ज्यादा रोमांचक चुनाव हुए साल 2010 में जब 15 साल तक बिहार में शासन करने वाले लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी को राजग ने अत्प्रत्यशित जीत के साथ सत्ता से बाहर कर दिया। 2004 के लोकसभा चुनावों में सत्ता से बाहर होने वाले राजग को बिहार चुनावों ने संजीवनी प्रदान कर दी थी।
भाजपा और जेडीयू की जोड़ी ने कुल 143 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी सरकार बनाई। इनमें 139 सीटों पर लड़ने वाली जेडीयू के हिस्से में 88 सीटें और 102 सीटों पर लड़ने वाली भाजपा के खाते में 55 सीटें आईं थी।
जबकि राजद को 175 सीटों पर लड़कर 54 पर ही जीत नसीब हुई। जबकि राम विलास पासवान की एलजेपी को 203 में से 10 सीट ही मिली पाईं थी। वहीं कांग्रेस को 51 सीटों पर लड़कर मात्र 9 सीट ही मिल पाई थी। दस साल बाद बिहार का परिदृश्य फिर बदला है और 17 साल तक एक दूसरे के दोस्त रहे जेडीयू और भाजपा दुश्मनों की तरह आमने सामने हैं।