बिहार में राजनीतिक दलों के जंगलराज या बिहारी अस्मिता को मुद्दा बनाने से इतर लोगों के बीच रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है। देश में सबसे अधिक युवा वोटर बिहार में हैं। उनके एजेंडे में बेरोजगारी सबसे ऊपर है। हर दूसरा युवा सबसे पहले रोजगार चाहता है। पिछले कुछ चुनावों में महिला वोटरों की भागीदारी ने उनके एजेंडे को भी अहम बनाया है, लेकिन उनके एजेंडे में भी रोजगार के अवसर प्रमुख हैं।
राज्य की सामाजिक एवं जातीय लामबंदी में भी ये मसले वजूद बनाये रखने में कामयाब हो रहे हैं। सवर्ण जहां भाजपा को रोजगार देने वाली पार्टी बता रहे हैं, वहीं पिछड़ों में नीतीश की छवि रोजगार पैदा करने वाले नेता की है।
समाजशास्त्री डॉ. एच झा भी मानते हैं कि इस मसले पर नीतीश और मोदी एक ही राजनीतिक स्कूल के छात्र हैं। दोनों की राजनीति करने की शैली कमोवेश एक समान ही है।
युवाओं और महिलाओं के ऊपर इन दोनों का सबसे ज्यादा फोकस रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश के प्रति युवाओं और महिलाओं के झुकाव ने ही उन्हें ऐतिहासिक सफलता दिलाई थी। लोकसभा चुनाव में ये तबका मोदी के पक्ष में खड़ा हो गया।
एक ओर नीतीश हैं, दूसरी ओर मोदी
एक ओर नीतीश हैं, तो दूसरी ओर मोदी। बेशक मोदी आज नीतीश से ज्यादा प्रभावी हैं, लेकिन बिहार में नीतीश का विकल्प कौन होगा, यह सवाल मोदी को नीतीश से कमजोर करता है। यही कारण है कि भाजपा नीतीश से ज्यादा इन तबकों को लालू पर केंद्रित करना चाहती है।
जंगलराज का एजेंडा पिछड़ों के मुकाबले भाजपा की ओर से अगड़ों में ज्यादा प्रभावी बनाया जा रहा है, लेकिन अगड़े भी इसे सबसे बड़ा मसला नहीं मानते।
बिजली व सड़क जैसे मुद्दे इस चुनाव में लोगों के एजेंडे में नहीं है। सब जानते हैं कि पिछले दस सालों में यही सबसे बड़ा एजेंडा था और इस पर ही सबसे अधिक काम भी हुआ है। भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था को लेकर चर्चा तो हो रही है, लेकिन इसे राष्ट्रव्यापी समस्या माना जा चुका है। स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम संतोषप्रद नहीं हैं, लेकिन पिछले दस सालों में कुछ नहीं बदला यह मानने को भी आम लोग तैयार नहीं हैं।
बंद कारखाने चालू नहीं हुए, नया निवेश नहीं हुआ, रोजगार के नये अवसर पैदा नहीं हुए और पलायन का क्रम बदस्तूर जारी है। ये ऐसे मसले हैं, जिससे हर तबका जूझ रहा है। राजनीतिक दलों के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं। इसके अलावा हर विधानसभा क्षेत्र की अपनी एक स्थानीय समस्या है, जिन पर राजनीतिक दल राज्य स्तर पर भी कोई राय नहीं रख पा रहे हैं।
ऐसे में युवाओं और महिलाओं का एजेंडा ही चुनाव का सबसे बड़ा एजेंडा होगा, जो लगभग तय हो चुका है। किसी भी दूसरे मसलों से ज्यादा रोजगार का मसला चुनावी परिणाम को प्रभावित करेगा। बिहार के युवाओं को चाहिए रोजगार, वो चाहे मोदी दें या नीतीश कुमार।