Bihar Election 2020: चुनावी एलान के बाद बिहार में बाढ़ एक बार फिर बड़ा मुद्दा है। राज्य में बाढ़ सालाना उर्स की तरह आती है। तबाही मचाकर चली जाती है। डूबते-उतराते लोगों ने हर साल की तबाही के बाद फिर से रचने-बसने की कला सीख ली है। इस साल भी 13 जिले बाढ़ से प्रभावित हैं।
बिहार में बाढ़ सिर्फ नेपाल से आने वाली नदियों से नहीं आती। बिहार में गंगा नदी यूपी से आती है। आरा, छपरा, हाजीपुर, पटना, बेगूसराय, मुंगेर, लखीसराय, भागलपुर होते हुए कटिहार के बाद पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है। यूपी से ही आने वाली घाघरा गोपलागंज, सीवान और छपरा में कई जगहों पर बाढ़ लाती है।
सोन, पुनपुन और फल्गु नदी झारखंड से आती हैं। सोन सासाराम, अरवल और आरा के बड़े हिस्से में बाढ़ लाती है। पुनपुन का पानी औरंगाबाद, जहानाबाद और पटना के कुछ हिस्सों को डुबोता है। फल्गु भी गया, जहानाबाद और पटना में तबाही मचाती है। महानंदा पश्चिम बंगाल से आती है। किशनगंज और कटिहार होते हुए फिर बंगाल चली जाती है।
बिहार में बाढ़ पर अध्ययन करने वाली कानपुर आईआईटी की टीम के प्रमुख राजीव सिन्हा ने साफ कहा था फरक्का में गंगा नदी पर बैराज बनने की वजह से गंगा में गाद भर गया है और नदी उथली हो गई है। गंगा का बहाव धीमा हुआ है, जिससे उसकी सहायक नदियों का बहाव भी कमजोर हुआ है। बिहार की सारी नदियां गंगा में ही मिलती हैं। जाहिर है गंगा का बहाव कम होने से बाकी सभी नदियों का बहाव कम हुआ है। बाढ़ की समस्या साल दर साल बढ़ती गई।
बाढ़ के मुद्दे पर नीतीश कुमार को घेरने वाले राजद यह भूल गया है कि उसके शासनकाल में भी बाढ़ से बिहार कराहता रहा है। तब भी सरकार ने आश्वासनों के के अलावा कुछ नहीं दिया था। बिहार में पिछले दस सालों में आई भयानक बाढ़ ने हजारों जिंदगियां लील लीं। राज्य के आपदा विभाग के मुताबिक बाढ़ से इस साल अब तक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
(मतलब लालू-राबड़ी शासनकाल से लेकर नीतीश कुमार के 15 वर्षों के शासन तक बाढ़ की तबाही एक ही रही और सरकारों का रवैया भी एक ही रहा।)