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बिहारः नीतीश के लिए कितने फायदेमंद लालू यादव

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बिहार में चुनावी सरगर्मी में इस समय अगर कोई व्यक्ति सबसे ज्यादा टेंशन में है तो वो हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। मुख्यमंत्री की दिक्कत ये है कि उनके पास पाने के लिए बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन खोने के लिए काफी कुछ।
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अगर वो चुनाव हारे तो उनके हाथ से मुख्यमंत्री की कुर्सी तो जाएगी ही आने वाले समय में उन्हें राजनीतिक वजूद बचाने के लिए भी जूझना पड़ सकता है। क्योंकि चुनाव हारते ही शायद ही कोई इस बात की गारंटी दे कि लालू यादव उनके साथ टिके रह पाएंगे।

और अगर चुनाव जीते और सीटों के गणित में वो राष्ट्रीय जनता दल से पिछड़े तो यह भी यकीन से नहीं कहा जा सकता कि राजनीति के घाघ खिलाड़ी लालू उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने देंगे। अपने बाद अपने बेटों को राजनीति में स्थापित करने की कवायद में जुटे लालू यादव इस मौके का फायदा अपने बेटों को आगे करके भी उठा सकते हैं।
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लालू के वोट बैंक में लगी सेंध

बिहार की राजनीतिक फिजा में यही सवाल इस समय सबसे ज्यादा तैर रहा है कि भाजपा से दोस्ती तोड़कर नीतीश कुमार लालू यादव से हाथ मिलाकर फायदे में रहेंगे या नुकसान में। बिहार में विपक्षी दल हमेशा लालू के शासन को जंगलराज के रूप में प्रचारित करते रहे हैं।

ऐसे में उनके डेढ़ दशक के शासन काल पर जंगलराज का ठप्पा लगा हुआ है। भाजपा इन चुनावों में नीतीश और महागठबंधन के खिलाफ नीतीश की इसी दुखती रग को मुद्दा बनाए हुए है। दूसरे कभी बिहार में यादव और मुस्लिमों वोटों पर एकतरफा दावा करने वाले लालू आज उतनी मजबूत ‌स्थिति में भी नहीं दिख रहे हैं।

मुस्लिम वोटों में ओवैसी सेंध लगाते दिख रहे हैं तो यादव वोटों में मुलायम सिंह यादव और पप्पू यादव के गठजोड़ वाला तीसरा मोर्चा। दलित वोटों को जीतन मांझी और पासवान झटकते दिख रहे हैं तो उच्च जातियों पर भाजपा हक जमाए बैठी है।

ऐसे में लालू यादव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए कितने प्रासंगिक रह जाते हैं यह तो आने वाले कुछ दिनों में पता चल ही जाएगा लेकिन तब तक नीतीश कुमार की टेंशन जरूर बढ़ी रहेगी।
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