औरंगाबाद जिले में गोह के पूर्व विधायक रणविजय सिंह ने पोस्टरबाजी से खुद को मिली जान से मारने की धमकी के बाद नक्सलियों को दो-दो हाथ करने की चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि नक्सली मुख्यधारा से भटके हुए लोग हैं। ये सिर्फ पर्चा साटकर धमकी देते हैं। अभी नक्सलियों की ताकत इतनी नहीं बढ़ गई है कि वे सांसद और विधायक को जान से मार दें।
पूर्व विधायक ने कहा, बस पर्चा साटकर ये लोगों के बीच भय पैदा करते हैं और अपनी दुकान चलाते हैं। वे अभी भी नक्सलियों से दो-दो हाथ करने को तैयार हैं। अभी न तो नक्सलियों का बल इतना बढ़ गया है और न ही सरकार इतनी कमजोर पड़ी है कि वे ऐसी धमकियों से डरेंगे।
आखिर क्यों नक्सलियों के निशाने पर गोह के पूर्व विधायक...
पूर्व विधायक पहले भी नक्सलियों के मंसूबे को ध्वस्त कर चुके हैं। साल 1981 में 29 जुलाई को दिन में तीन बजे नक्सलियों ने जमीन को कब्जा करने को लेकर दर्जनों हथियारबंद दस्तों ने आक्रमण किया था, जिसका जवाब पूर्व विधायक ने दृढ़ता से दिया था। इसके बाद नक्सलियों ने साल 1984 मे डिहरी गांव में लगाए गए उनके फसल पर प्रतिबंध लगाया था। प्रतिबंध के बाद पूर्व विधायक के पिता और गांव के रामदास सिंह एवं गांव के कमेश्वर सिंह फसल को कटवाकर जब अपने घर लौट रहे थे, तो उस समय नक्सलियों ने हत्या करने के लिए बम फेका था। बम के विस्फोट से रामदास सिंह (अब स्वर्गीय) के हाथ की बंदूक टूट गई थी और वे गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे। उस समय गोह थाना में पूर्व विधायक के बयान पर कांड संख्या 24/84 दर्ज किया गया था।
पूर्व विधायक पर गोली चली थी...
साल 1990 में गांव में ही घात लगाए नक्सलियों ने पूर्व विधायक पर पीछे से गोली चलाई थी, जो उनके कमर में लगी। इस मामले में गोह थाना में प्राथमिकी संख्या 105/90 दर्ज हुआ था। साल 1992 में डाकिया के पद पर कार्यरत उनके सहयोगी अनिरुद्ध सिंह जब कोच थाना क्षेत्र के पांडेयखाप गांव से चिट्ठी बांटकर लौट रहे थे तो नक्सलियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसकी प्राथमिकी कोच थाना में कांड संख्या 121/92 के रूप में दर्ज हुई थी। साल 1992 में नक्सलियों ने उनकी फसल भी लूटी थी। उस समय भी गोलीबारी हुई थी, जिसमें पूर्व विधायक बच गए थे। मामले में गोह थाना में कांड संख्या 104/92 दर्ज हैं, जो न्यायालय में लंबित है। साल 1993 में पूर्व विधायक के सहयोगी बालचंद यादव की हत्या पंचायन बिगहा गांव के पास नक्सलियों ने गर्दन काटकर कर दी थी। साल 1993 में 29 नवंबर की रात फसल बर्बाद करने के मामले में दो घंटे गोली बारी हुई थी। साल 1994 में पूर्व विधायक के घर पर नक्सलियों ने आक्रमण किया था, उस वक्त दो घंटे तक गोलीबारी हुई थी। इसकी प्राथमिकी गोह थाना में कांड संख्या 78/94 दर्ज है।
वहीं, साल 1994 में ही डिहुरी में खलिहान लूटने में केस दर्ज हुआ था। इसकी प्राथमिकी का कांड संख्या 86/94 दर्ज है। साल 1998 में पूर्व विधायक दशहरा में दधपी मेला देखकर लौट रहे थे, उसी समय दधपी में ही नक्सलियों ने उन पर गोलीबारी किया था। चार घंटे की गोलीबारी के दौरान उनके सहयोगी दादर गांव निवासी ललन सिंह को गोली लगी थी, जो इलाज के बाद ठीक हो गए थे। मामले में कांड संख्या 84/98 दर्ज किया गया था। इसके बाद 2005 के तीन फरवरी को विधानसभा चुनाव शांति पूर्ण संपन्न होने के बाद उनके गांव में स्थापित पुलिस पिकेट हटाया गया तो 12 फरवरी को घर पर नक्सलियों ने आक्रमण किया था, जिसमें लैंड माइंस भी ब्लास्ट किया गया। लेकिन नक्सली विधायक को उड़ाने में सफल नहीं हुए। उस समय 10 बजे रात से तीन बजे अहसुबह तक पांच घंटे गोलीबारी हुई थी और नक्सलियों को भी गोली लगी थी।
मौके पर खून का धब्बा मिला था, लेकिन किसी का शव नहीं मिला था। उसके बाद से इलाके में शांति का माहौल था। इस बीच साल 2013-14 में भी जमीन कब्जा को लेकर पोस्टरबाजी हुई थी। बंदेया में थाना स्थापित करने को लेकर साल 1998-99 में ही औरंगाबाद के तत्कालीन एसपी आरके मिश्रा ने प्रस्ताव किया था। इसी के आलोक में 2013 में बंदेया थाना स्थापित हुआ। इसके बाद से शांति माहौल कायम है, लेकिन पोस्टरबाजी कर नक्सलियों ने शांति में फिर से खलल डाला है।