सरकारी शारीरिक शिक्षक झालमूड़ी बेचते हुए।
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बिहार के भागलपुर की यह तस्वीर सरकारी व्यवस्था की उस हकीकत को सामने लाती है, जिसे देखकर शायद आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे। एक तरफ सरकारी स्कूल में बच्चों को पीटी कराने वाले शिक्षक और दूसरी तरफ उसी स्कूल के बाहर झालमुड़ी की दुकान। जी हां, भागलपुर के सन्हौला प्रखंड में एक सरकारी शारीरिक शिक्षक बच्चों को पढ़ाने और पीटी कराने के बाद स्कूल के बाहर झालमुड़ी और स्टेशनरी की दुकान लगाते हैं। वजह है महज 16 हजार रुपये की तनख्वाह में परिवार का खर्च नहीं चल पाना।
भागलपुर के सन्हौला प्रखंड के अमडंडा मध्य विद्यालय में शारीरिक शिक्षक एवं स्वास्थ्य अनुदेशक के रूप में कार्यरत निशांत कुमार वर्ष 2022 में नियुक्त हुए थे। उस समय उन्हें महज 8 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था।
करीब तीन साल तक संघर्ष और प्रदर्शन के बाद उनका वेतन बढ़कर 16 हजार रुपये हुआ, लेकिन महंगाई के दौर में यह रकम भी परिवार चलाने के लिए नाकाफी साबित हो रही है। निशांत स्कूल में करीब दो घंटे की ड्यूटी करने के बाद विद्यालय के बाहर झालमुड़ी और स्टेशनरी की दुकान लगाते हैं। दुकान पर बच्चों और स्थानीय लोगों की भीड़ जुटती है और उन्हें प्रतिदिन करीब 300 से 400 रुपये की अतिरिक्त कमाई हो जाती है।
निशांत का कहना है कि शुरुआत में दुकान लगाने में शर्मिंदगी महसूस हुई, लेकिन परिवार की जरूरतों ने उन्हें यह काम करने के लिए मजबूर कर दिया।
जिन बच्चों को पीटी कराते हैं, उन्हीं को बेचते हैं झालमुड़ी
सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि जिन बच्चों को निशांत स्कूल में पीटी कराते हैं, उन्हीं बच्चों को वह स्कूल के बाहर झालमुड़ी बेचते हैं। बच्चे भी कहते हैं कि सर अच्छी पीटी करवाते हैं, लेकिन कम वेतन के कारण उन्हें दुकान लगानी पड़ रही है। निशांत कहते हैं कि अगर सरकार उन्हें पूर्णकालिक करे और वेतन में उचित बढ़ोतरी करे, तो उन्हें अतिरिक्त काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
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उनका कहना है कि कई शारीरिक शिक्षक कोई डिलीवरी बॉय बनकर तो कोई अन्य छोटा-मोटा काम कर परिवार चलाने को मजबूर हैं। अब सवाल यह है कि बच्चों को स्वस्थ और अनुशासित रखने की जिम्मेदारी संभालने वाले इन शिक्षकों की जिंदगी कब सुधरेगी? क्या 16 हजार रुपये में परिवार चलाने की चुनौती सरकार तक पहुंचेगी?